महिला आयोग की सख्ती: भरण-पोषण विवाद में BSP पर जताई नाराजगी, सुनवाई में उठे गंभीर सवाल

रायपुर.

छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डाॅ. किरणमयी नायक, सदस्य सरला कोसरिया एवं ओजस्वी मंडावी ने आज आयोग के कार्यालय रायपुर में महिला उत्पीड़न से संबंधित प्रकरणों पर सुनवाई की। भिलाई स्टील प्लांट अपने पुरूष कर्मचारियों को किस तरह से बचाता है यह महिला आयोग में साबित हुआ है।

पुरूष कर्मचारी दो-दो महिलाओं से अवैध रिश्ता रखता है और अपने पत्नी बच्चे को भरण-पोषण नहीं देता। महिला आयोग की सुनवाई में इनके अधिकारी उपस्थित होते हैं और आश्वासन देते हैं कि पत्नी और उनके बच्चों को पर्याप्त भरण-पोषण पति के वेतन से दिया जाएगा। सुनवाई के बाद में आफिस में जाकर मामले की लिपापोती करते हैं। इसकी पुष्टि होने पर जब पूछताछ की गई तो भिलाई स्टील प्लांट ने कहा कि हमने लाॅ डिपार्टमेंट को भेजा था, कर्मचारी ने लिखकर दे दिया इसलिए हम भरण-पोषण व वेतन की राशि नहीं दे सकते।

भिलाई स्टील प्लांट ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। कुल मिलाकर कोई भी पुरूष जो भिलाई स्टील प्लांट में कार्यरत् है वह अपनी पत्नी बच्चों को परेशान कर सकता है, अवैध रिश्ते में रह सकता है, पत्नी-बच्चों को भूखे मारने के लिए छोड़ सकता है। फिर भी भिलाई स्टील प्लांट कुछ भी कार्य नहीं करेगा। अपने कर्मचारियों के खिलाफ कोई शिकायत नहीं करेगा। इस बात पर आज महिला आयोग ने बीएसपी के शीर्ष अधिकारी को जमकर लताड़ लगाई।

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एक प्रकरण में आवेदिका पत्नी अपने ससुराल में रहना चाहती है, लेकिन पति उसे ले जाने के लिए तैयार नहीं है। अनावेदक पक्ष द्वारा आवेदिका पर दबाव डालकर स्टाम्प पेपर पर लिखा-पढ़ी करके तलाक दिया, जिसमें समाज के कुछ लोगों ने उपस्थित होकर आवेदिका को कहा कि तुम्हारा तलाक हो गया। इस मामले में आयोग ने कहा कि इस तरह के दस्तावेज से वैधानिक तलाक नहीं होता। अनावेदक पक्ष आवेदिका को कोई भरण-पोषण नहीं देता, आवेदिका का स्त्रीधन भी वापस नहीं किया। आवेदिका अपने पति के साथ रहना चाहती है, लेकिन अनावेदक के माता, पिता व भाई उसके वैवाहिक जिंदगी में बाधा बन रहे हैं। अनावेदक को पूछने पर वह सुलहवार्ता के लिए तैयार नहीं है। इस स्तर पर आवेदिका ससुराल पक्ष के खिलाफ थाने में एफआईआर दर्ज करवा सकती है।

एक अन्य प्रकरण में आवेदिका के स्व. पति से दो बेटियां है। अनावेदक उसका देवर है। गांव की संयुक्त संपत्ति बरौडा व कांपा में है, मकान व खेत भी है, जिसमें आवेदिका अपनी दोनों बेटियों का हक व हिस्सा चाहती है, जिसे अनावेदक ने स्वीकारा और बताया कि संयुक्त संपत्ति में आवेदिका की दोनों बेटियों का नाम है और हिस्सा देने के लिए वह तैयार है। आयोग ने समझाइश दिया कि आवेदिका आज ही जाकर बरौंडा व कांपा के मकान में अपना कब्जा ले व खेती की जमीन पर तहसील न्यायालय में नाम व खाता अलग कराने की कार्यवाही कर सकते हैं। कब्जा प्राप्त करने के पश्चात् आयोग को सूचित करें, ताकि प्रकरण नस्तीबध्द किया जा सके।

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एक अन्य प्रकरण में अनावेदक ने बताया कि भारत माला परियोजना में कोलिहापुरी की लगभग ढाई एकड़ जमीन निकली, जिसका मुआवजा लगभग 1 करोड़ 64 लाख रुपए अनावेदक के एकाउंट में है। इस संपत्ति में आवेदिका अपना एक चौथाई हिस्सा चाहती है। उसके अन्य दो भाई और है। आवेदिका के अनुसार कलेक्टर दुर्ग से इस परियोजना के तहत 2 गुना कीमत प्राप्त हुआ है, शेष 2 गुना कीमत के लिए मामला लंबित है। आयोग द्वारा कलेक्टर दुर्ग को पत्र प्रेषित कर बैंक ऑफ बडौदा के ब्रांच मैनेजर गंजपारा में अनावेदक के बैंक एकाउंट में दर्ज मो. नं. के बैंक खाते के ट्रांजेक्शन को तत्काल प्रभाव से रोक लगाने अनुशंसा की जाएगी, ताकि सुलहनामा की प्रक्रिया पूर्ण किया जा सके। अनावेदक को अगली सुनवाई में सभी अनावेदकगणों को साथ लाने को कहा गया, ताकि आयोग के समक्ष उपस्थित होकर सुलहनामा पर चर्चा किया जा सके।

एक अन्य प्रकरण में आवेदक ने अपनी पत्नी व बहू की ओर से प्रकरण दर्ज किया था, जिसमें अनावेदक आरक्षक व उसकी पत्नी महिला आरक्षक के विरूध्द अपराध दर्ज किया था। शेष अनावेदक थाना- पिपरिया, जिला- कबीरधाम के पुलिस अधिकारी व कर्मचारी हैं। सभी अनावेदक पुलिस कर्मचारी है। इस प्रकरण में आरक्षक व उसकी पत्नी महिला आरक्षक आवेदकों के पड़ोसी है। वह अपनी पुलिसिया हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए फर्जी एफआईआर दर्ज कराकर षड्यंत्र पूर्वक आवेदक की पत्नी, बहू व उसके नाबालिग 4 माह के बेटा को 2 माह तक जेल में रखा गया था।

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आवेदक पक्ष उनकी पत्नी व बहू ग्रामीण होने के कारण अनावेदकों के पुलिसिया चक्रव्हूह से नहीं निकल पाए और उन्हें न्यायालय से 45 दिन की सजा हुई। आवेदक पक्ष की शिकायत को किसी भी पुलिस अधिकारी ने इसलिए दर्ज नहीं किया, क्योंकि शिकायतकर्ता स्वयं पुलिस है। सभी पुलिस वालों ने अपने ही विभाग के आरक्षक की शिकायत पर आवेदक की बहू, पत्नि को नाबालिग बच्चे सहित जेल में डाल दिया था।

आयोग द्वारा प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत जांच कराने छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस जवाबदेही प्राधिकार कार्यालय शंकर नगर को पत्र प्रेषित करने का आदेश दिया था। इस प्रकरण को छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस जवाबदेही प्राधिकार कार्यालय में भेजकर सभी पुलिस अधिकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर प्रतिवेदन 1 माह के भीतर प्रेषित करने का आदेश आयोग ने दिया। साथ ही डीजीपी छत्तीसगढ़ को पुलिस अधिकारी व कर्मचारियों के खिलाफ अपने पद का दुरूप्योग करने के लिए उचित कार्रवाई की अनुशंसा भी आयोग द्वारा की जाएगी।

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