वॉशिंगटन
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक बड़ा सैन्य कदम उठाया जा सकता है. CNN की खबर के मुताबिक सूत्रों ने बताया कि अमेरिकी सेना इस वीकेंड तक (22 फरवरी तक) ईरान पर हमला करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है. सूत्रों ने बताया कि व्हाइट हाउस को जानकारी दे दी गई है कि अगर आदेश मिलता है तो अमेरिकी सेना कुछ ही घंटों में कार्रवाई कर सकती है. पिछले कुछ दिनों में मिडिल ईस्ट में अमेरिकी वायु और नौसैनिक ताकत में भारी बढ़ोतरी की गई है. दुनिया का सबसे आधुनिक विमानवाहक पोत USS गेराल्ड आर फोर्ड क्षेत्र में पहुंच सकता है.
ईरान और अमेरिका में नहीं हो सकी डील
ब्रिटेन में तैनात अमेरिकी फाइटर जेट और ईंधन भरने वाले टैंकर विमानों को मिडिल ईस्ट में भेजा जा रहा है. एक सूत्र ने कहा, ‘राष्ट्रपति इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. वह सैन्य कार्रवाई के पक्ष और विपक्ष दोनों तर्क सुन रहे हैं.’ मंगलवार को जिनेवा में ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच करीब साढ़े तीन घंटे तक अप्रत्यक्ष बातचीत हुई. ईरान ने कहा कि कुछ ‘मार्गदर्शक सिद्धांतों’ पर सहमति बनी है, लेकिन अमेरिकी पक्ष का कहना है कि अभी कई मुद्दों पर साफ बातचीत होनी बाकी है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने कहा कि कूटनीति ट्रंप की पहली पसंद है, लेकिन सैन्य विकल्प भी मेज पर मौजूद है. उन्होंने किसी समयसीमा का ऐलान करने से इनकार किया.
ईरान पर बढ़ा परमाणु दबाव
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 28 फरवरी को इजरायल जाएंगे और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात करेंगे. इजरायल लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है. उधर सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिले हैं कि ईरान अपने परमाणु ठिकानों को और मजबूत कर रहा है. कई महत्वपूर्ण स्थलों को कंक्रीट और मिट्टी की मोटी परत से ढका जा रहा है, ताकि संभावित हवाई हमलों से बचाव हो सके.
एक और वॉर्निंग
लेविट ने बताया है कि ट्रंप कई लोगों से इस संबंध में बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'राष्ट्रपति कई लोगों से बात कर रहे हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम है। राष्ट्रपति इस मामले को बहुत गंभीरता से लेते हैं। वे हमेशा वही सोचते हैं जो अमेरिका, हमारी सेना और अमेरिकी जनता के हित में हो, और किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई का निर्णय वे इसी आधार पर लेते हैं।'
ईरान से बातचीत
लेविट का बयान ऐसे समय में आया है, जब जिनेवा में अमेरिका-ईरान के बीच परमाणु वार्ता फिर से शुरू हुई है, जिसमें अमेरिका के दूत स्टीव विटकॉफ और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ओमानी मिल रहे हैं। हालांकि दोनों पक्षों ने बात कुछ आगे बढ़ने की बात कही है, लेकिन अधिकारियों ने कहा है कि अभी भी काफी कमियां हैं। इधर, अमेरिका सेना लगातार ऐक्शन मोड में नजर आ रही है।
ईरान ने भी धमकाया
एजेंसी वार्ता के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की ओर से 2025 की शुरुआत में अपनाई गई अधिकतम दवाब की नीति ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला है, जिससे अमेरिका के अधिकारी कूटनीति सफलता के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर रहे हैं। इसके बावजूद ईरान प्रतिबंध में राहत की मांग कर रहा है और उसने चेतावनी दी है कि अमेरिका का कोई भी हमला इस इलाके में अमेरिकी सेना के खिलाफ जवाबी कार्रवाई शुरू कर देगा।
बात फेल तो शुरू होगा वॉर
हाल ही में अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस के हालिया टिप्पणियों के अनुरूप है, जिन्होंने एक न्यूज चैनल को बताया था कि अमेरिकी प्रशासन को कूटनीति के जरिये समस्या का समाधान बहुत पसंद है, लेकिन अगर बातचीत विफल हो जाती है तो सैन्य कार्रवाई लेने का विकल्प भी उसके पास है।
ट्रंप क्या करेंगे फैसला?
फिलहाल राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर साफ टार्गेट नहीं बताया है कि हमला होने की स्थिति में उसका अंतिम उद्देश्य क्या होगा. उन्होंने सिर्फ इतना कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन बेहद अहम होंगे. अगर बातचीत में ठोस प्रगति नहीं होती, तो मिडिल ईस्ट एक बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है. वहीं, अगर कूटनीति सफल होती है तो आखिरी वक्त पर युद्ध टल भी सकता है.
सैन्य जमावड़ा और 'आर्मडा' की तैनाती
अमेरिका ने ईरान के तट के पास अपनी सैन्य शक्ति को अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ा दिया है।
नौसेना: ईरान के करीब इस समय दो एयरक्राफ्ट कैरियर (विमान वाहक पोत) और एक दर्जन युद्धपोत तैनात हैं।
वायुसेना: सैकड़ों लड़ाकू विमान, जिनमें F-35, F-22 और F-16 शामिल हैं, क्षेत्र में पहुंच चुके हैं।
रसद और हथियार: पिछले 24 घंटों में 150 से अधिक सैन्य कार्गो उड़ानों के जरिए भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद अमेरिकी ठिकानों पर पहुंचाया गया है।
निगरानी: जापान, जर्मनी और हवाई से विशेष E-3 अर्ली वार्निंग विमानों को सऊदी अरब भेजा गया है, जो बड़े पैमाने पर हवाई हमलों के समन्वय में मदद करेंगे।
कूटनीतिक विफलता और कारण
इस संभावित हमले का मुख्य कारण कूटनीतिक बातचीत का विफल होना बताया जा रहा है।
परमाणु विवाद: जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ के नेतृत्व में बातचीत का प्रयास विफल रहा क्योंकि ईरान ने परमाणु विकास रोकने की ट्रंप की मांग को खारिज कर दिया।
शासन परिवर्तन: सूत्रों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य केवल सैन्य ठिकानों को तबाह करना नहीं, बल्कि ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' लाना भी हो सकता है। इसमें इजरायल और अमेरिका मिलकर ऑपरेशन चला सकते हैं।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और वैश्विक प्रभाव
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की बंदी: ईरान ने सैन्य अभ्यास के नाम पर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को आंशिक रूप से बंद कर दिया है। दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है।
धमकी: ईरानी नेतृत्व और अयातुल्ला ने अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने की धमकी दी है। यदि यह मार्ग पूरी तरह बंद होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर विनाशकारी असर पड़ सकता है।
अमेरिकी घरेलू राजनीति पर असर
रिपब्लिकन: आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले इस कदम को राष्ट्रपति की स्थिति मजबूत करने या जोखिम में डालने वाले मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
डेमोक्रेट्स: हाउस माइनॉरिटी लीडर हकीम जेफरीज ने चेतावनी दी है कि ट्रंप अकेले युद्ध का फैसला नहीं ले सकते। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी अनिवार्य है।
यदि यह हमला होता है, तो यह 2003 के इराक युद्ध के बाद सबसे बड़ा और सबसे परिणामी सैन्य आक्रमण होगा। दुनिया की नजरें अब व्हाइट हाउस पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप शांति का रास्ता चुनेंगे या 'ऑल-आउट वार' का आदेश देंगे।
कुछ जरूरी सवालों के जवाब
1. क्या अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो गया है?
अभी युद्ध शुरू नहीं हुआ है, लेकिन हालात बहुत गंभीर हैं। अमेरिकी सेना 'स्टैंडबाय' पर है और ट्रंप किसी भी वक्त अंतिम फैसला ले सकते हैं। राजनयिक कोशिशें अभी भी जारी हैं, लेकिन उनमें खास सफलता नहीं मिली है।
2. ईरान ने समुद्र का रास्ता क्यों बंद किया?
ईरान ने इसे एक चेतावनी के तौर पर किया है। वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि अगर अमेरिका उस पर हमला करता है, तो वह वैश्विक तेल सप्लाई को रोक सकता है। इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुँच सकता है।
3. इस युद्ध का बाकी दुनिया पर क्या असर होगा?
अगर यह युद्ध छिड़ता है, तो सबसे पहला असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा। चूंकि ईरान और उसके पड़ोसी देश तेल के बड़े उत्पादक हैं, इसलिए सप्लाई रुकने से महंगाई बहुत बढ़ सकती है। साथ ही, यह एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है जिसमें कई और देश शामिल हो सकते हैं।


