MP में खाद संकट का मिलेगा स्मार्ट समाधान, कृषि अधिकारी ने बनाया किसान-केंद्रित ऐप

ग्वालियर 

 मध्य प्रदेश में किसान खाद की किल्लत से परेशान हैं. कई जिलों में रात रात भर किसान लाइन में लगकर खाद लेने के लिए परेशान होते रहते हैं, तो कहीं किसान बार बार लाइन में लगकर खाद खरीदते दिखाई देते हैं, इस तरह के हालात प्रदेश में खाद संकट पैदा करते हैं. अब इस खाद की समस्या का भी हल ढूंढ लिया गया है. इसका हल ढूंढने वाला कोई आईएएस स्तर का अफसर या नेता नहीं, बल्कि प्रदेश के एक ब्लॉक में पदस्थ एक सरकारी कर्मचारी है. उसने ये करनामा अपनी पढ़ाई और ट्रेनिंग के बलबूते पर कर दिखाया है.

किसानों को मिल सकेगा जरूरत के अनुसार खाद

असल में खाद को लेकर होने वाली समस्याओं को देखते हुए कृषि विभाग के एक युवा कृषि विस्तार अधिकारी ने एक ऐसा सिस्टम डेवलप किया, जिससे हर किसान को उसकी असल जरूरत के अनुसार पर्याप्त खाद मिल सकेगी. साथ ही खाद की कालाबाजारी भी रुकेगी. ये एक तरह का वेब आधारित एप्लिकेशन है, जिसे ग्वालियर के विशाल यादव ने तैयार किया है. 

कृषि विभाग का नया प्रयोग

विशाल यादव ग्वालियर के डबरा ब्लॉक में कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर पदस्थ हैं. उन्होंने खुद से कोडिंग कर एक वेब ऐप बनाया है. जिसे नाम दिया गया है फर्टिलाइजर डिस्ट्रीब्यूशन डेटाबेस. ये एक ऐसा ऐप है जिसे ऑनलाइन ही उपयोग किया जा सकता है और इसका एक्सेस सिर्फ कृषि विभाग के पास है. और यह सिस्टम ग्वालियर के डबरा और भितरवार ब्लॉक में लागू भी कर दिया गया है. 

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कैसे आया खाद वितरण के लिए सिस्टम बनाने का आईडिया?

विशाल यादव ने बताया कि, "हम हर साल खाद की किल्लत और परेशान होते किसानों को देखते थे. कई बार कुछ किसान तो खाद ले ही नहीं पाते थे, तो कई किसान बार बार लाइन में लगकर 4 से 5 बार खाद इशू करा लेते थे. इस तरह की स्थिति ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम क्या ऐसा कर सकते हैं, जिससे जरूरतमंद किसानों को खाद मिल सके. इसके लिए हमने इस बारे में डबरा एसडीएम से बात की और उनके सहयोग से ये वेब ऐप तैयार किया." 

ग्वालियर में किया लागू, प्रदेश की तैयारी

इस वेब ऐप के डेवलप होने के बाद शासन ने ग्वालियर अंचल में इसे लागू भी कर दिया गया है. डबरा और भितरवार क्षेत्र में इसी सिस्टम के जरिए किसानों को खाद का वितरण भी किया जा रहा है. अगर यह ऐप इस क्षेत्र में सही से काम किया तो आने वाले समय में पूरे प्रदेश में इसे अपनाया जा सकता है. 

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कैसे काम करता है खाद वाला 'वेब ऐप'

विशाल यादव से बातचीत में इस वेब ऐप के काम करने का तरीका भी पता चला. उन्होंने बताया कि, "ये ऐप कंप्यूटर और लैपटॉप पर काम करता है. इसे किसी भी कंप्यूटर बेस्ड सिस्टम से एक्सेस किया जा सकता है. इसका सर्वर भी गूगल शीट पर आधारित है, जहां सारा डेटा सेव होता है. इस ऐप के जरिए किसानों की पहचान उनके समग्र आईडी और आधार कार्ड से की जाती है. साथ ही उसकी जमीन का रकबा भी दर्ज कर दिया जाता है, उसी के आधार पर उसकी पात्रता निर्धारित की जाती है. 2 बीघा जमीन पर किसान को एक बैग डीएपी दी जाती है और एक बीघा जमीन पर एक बैग यूरिया के हिसाब से पात्रता दर्ज होती है. 

कैसे तय होगा रकबा, कितना खाद ले सकेंगे किसान?

अब सवाल आता है कि "इस वेब ऐप सिस्टम में किसान का रकबा कैसे निर्धारित होगा, तो आपको बता दें कि जब खाद वितरण केंद्र पर किसान अपनी किताब लेकर पहुंचता है. उसी समय उसकी किताब में लिखा जमीन का रकबा सिस्टम में मैनुअली एंट्री कर अपलोड कर दिया जाता है. ऐसे में उसकी जमीन का जितना रकबा है. उसके हिसाब से खाद की मात्रा भी निर्धारित कर एंट्री कर दी जाती है. किसान जितनी खाद लेता है, उसकी तय पात्रता खाद पात्रता में सिस्टम घटा देता है और वह तब तक खाद ले सकता है जब तक उसका खाद कोटा पूरा नहीं होता. एक बार उसने पात्रता के हिसाब से खाद कोटा पूरा कर दिया तो फिर आगे उसे खाद नहीं दिया जाएगा. 

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कैसे कृषि अधिकारी बना वेब डेवलपर?

एक कृषि विस्तार अधिकारी आखिर एक वेब डेवलपर का काम कैसे कर सका? तो इसका जवाब यह है कि, विशाल यादव ने मूल रूप से एग्रीकल्चर में बीएससी स्नातक किया था. इसी बीच उन्होंने केंद्र सरकार के प्रोग्राम के तहत जावा (JAVA) लैंग्वेज, जो एक तरह की सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट लैंग्वेज है. वो भी सीखी थी और खाद समस्या को दूर करने में उनका यह कौशल कारगर सिद्ध हुआ है. 

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