डीप स्टेट क्या है? वेनेजुएला, बांग्लादेश और ईरान से जुड़कर क्यों फिर चर्चा में आया यह शब्द

नई दिल्ली
वेनेजुएला में फिलहाल अमेरिकी नियंत्रण है। वहां से उत्पादन होने वाले तेल पर भी अमेरिका का ही कब्जा है और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो अगवा करके रखे गए हैं। उनके खिलाफ अमेरिकी अदालत में मुकदमा चल रहा है। इसी बीच ईरान में अयातुल्लाह खामेनेई के शासन के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं। सीरिया में सरकार बदल गई है और अब अमेरिका से उसके रिश्ते बेहतर हैं। बांग्लादेश में फिलहाल शेख हसीना निर्वासित हैं और वहां अंतरिम शासक के तौर पर मोहम्मद युनूस ने कमान संभाल रखी है। वहीं वेनेजुएला में चर्चा है कि अमेरिका अपने ही किसी करीबी को सत्ता पर बिठाएगा। इन देशों में जिस तरह से नाटकीय घटनाक्रम के तहत सत्ताओं का परिवर्तन हुआ है। उससे एक बार फिर से डीप स्टेट की चर्चा तेज है। आखिर क्या है यह डीप स्टेट…
 
डीप स्टेट का आशय उस स्थिति से होता है, जब किसी देश की शासन व्यवस्था में बाहरी तत्वों या उनसे प्रेरित लोगों की घुसपैठ हो जाए। इसके अलावा डीप स्टेट उस स्थिति को भी कहा जाता है, जब किसी अन्य ताकतवर देश से प्रेरित लोग स्थानीय जनता को सरकार के खिलाफ उकसा दें और सत्ता परिवर्तन की स्थिति पैदा करें। डीप स्टेट नाम से ही आशय है कि जिसकी जड़ें गहरी हों। आमतौर पर डीप स्टेट को अमेरिका से जोड़कर देखा जाता है, जो अकसर दुनिया के तमाम देशों में इसलिए भी सरकारें बदलवाना चाहता है कि वे उसके हित में काम करें।

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ईरान में फिलहाल रजा पहलवी का नाम चर्चा में है, जो निर्वासित क्राउन प्रिंस के तौर पर देश से बाहर हैं। अभी जो आंदोलन ईरान की सत्ता के खिलाफ चल रहे हैं, उनमें रजा पहलवी का नाम भी उछल रहा है। पहलवी के अमेरिका से करीबी संबंध रहे हैं। इसलिए ईरान को लेकर भी डीप स्टेट की चर्चा हो रही है। डीप स्टेट का आशय किसी देश की सत्ता, खुफिया एजेंसियों और सैन्य बलों को प्रभावित करने से है। अकसर ऐसा उदारवादी मूल्यों को बढ़ावा देने के नाम पर किया जाता है। यह प्रचार किया जाता है कि कैसे सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को समाप्त कर रही है और कट्टरता बढ़ रही है। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार जैसे मसले भी मुद्दा बना दिए जाते हैं।

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कैसे डीप स्टेट बदलता है नैरेटिव
इस संबंध में स्टीफन किन्ज़र की पुस्तक Overthrow: America's Century of Regime Change from Hawaii to Iraq विस्तार से प्रकाश डालती है। डीप स्टेट के कारनामों में थिंक टैंक, एनजीओ और पक्षपाती मीडिया का भी इस प्रकार प्रयोग किया जाता है कि देश में नैरेटिव बदले। आम लोगों में सरकार के प्रति धारणा बदले और वह आंदोलन की शक्ल ले ले। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, जब पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन के पश्चात इमरान खान ने ऐसे ही आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि अमेरिका के इशारे पर मेरी सरकार के खिलाफ पूरा विपक्ष और सेना एकजुट हुए हैं। फिर जिस तरह से आसिम मुनीर की अमेरिका से करीबी दिखी है, उसने भी ऐसे संदेहों को बल दिया है।

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