BJP से मिली करारी हार के बाद अजीत पवार फडणवीस सरकार से इस्तीफा देंगे? सवालों ने पकड़ा जोर

 मुंबई

महाराष्ट्र के सभी नगर निकाय चुनावों के परिणाम आ चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी ने पुणे (PMC) और पिंपरी-चिंचवाड़ (PCMC) में अपना दबदबा न केवल बरकरार रखा है, बल्कि उसे और मजबूत किया है। अजीत पवार और शरद पवार की एकजुटता का दांव भाजपा के विजय रथ को रोकने में नाकाम रहा। भाजपा ने दोनों नगर निगमों में पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है।

पुणे में भाजपा को 165 में से 110 सीटें मिली हैं। वहीं, एनसीपी और शरद पवार कैंप को मात्र 2 सीटें मिली हैं। पिंपरी-चिंचवाड़ (PCMC) की 128 सीटों में से भाजपा को 81 और अजीत गुट को सिर्फ 36 सीटें मिली हैं। भाजपा ने पहली बार इन दोनों नगर निगमों में अपने दम पर सत्ता हासिल की है। इससे पहले वह गठबंधन का हिस्सा रही थी।
पवार फैमिली का भविष्य क्या है?

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अजीत पवार और शरद पवार के फिर से साथ आने के बावजूद मिली इस करारी हार ने दोनों गुटों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। महायुति सरकार में रहते हुए भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ना और भ्रष्टाचार के आरोप लगाना उनके लिए उल्टा पड़ गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने यहां तक कह दिया कि पार्टी को अजीत पवार को साथ लेने पर पछतावा है। अब अजीत पवार को या तो भाजपा के सामने झुककर रहना होगा या फिर पूरी तरह अपने चाचा के साथ विलय की संभावना तलाशनी होगी।

महाराष्ट्र

शरद पवार की पार्टी 24 नगर निकायों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। पुणे जैसे अपने गढ़ में मात्र 2 सीटें जीतना पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के चरमराने का संकेत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए दोनों NCP गुटों का स्थायी रूप से मिल जाना ही उनके बचने का एकमात्र रास्ता हो सकता है। कार्यकर्ताओं में भी अब स्थिरता की मांग बढ़ रही है।
भाजपा की जीत के 4 कारण

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1. परिवारवाद पर प्रहार: भाजपा ने नीति बनाई कि किसी भी मौजूदा विधायक या सांसद के रिश्तेदार को टिकट नहीं दिया जाएगा। इससे मुरलीधर मोहोल और मेधा कुलकर्णी जैसे बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को भी टिकट नहीं मिला, जिससे आम कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश गया।

2. नए चेहरों को मौका: पुणे में भाजपा ने अपने 97 में से 30 मौजूदा पार्षदों के टिकट काटकर नए और जमीनी कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारा।

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3. विपक्ष के मजबूत चेहरों को तोड़ा: चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने बापू पठारे के परिवार (NCP-SP) और अभिजीत शिवरकर (कांग्रेस) जैसे प्रभावी स्थानीय नेताओं को अपने पाले में कर लिया।

4. इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस: मेट्रो विस्तार, रिंग रोड और कोस्टल रोड जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स ने शहरी मतदाताओं को भाजपा की ओर आकर्षित किया।

इस जीत के साथ देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। अब सबकी नजरें जिला परिषद चुनावों पर हैं, जहां यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अजीत पवार और शरद पवार का गठबंधन जारी रहता है या हार के बाद वे फिर से अलग रास्ते चुनते हैं।

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