छोटे किसानों की किस्मत संवार रही लेमनग्रास खेती

रायपुर.

लेमनग्रास की खेती से बदल रही छोटे किसानों की किस्मत

लेमनग्रास की खेती छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है, क्योंकि इसमें लागत कम, मुनाफा ज़्यादा है और यह बंजर ज़मीन पर भी होती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो रही है और वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं। यह फसल कीटों और जंगली जानवरों से सुरक्षित रहती है, एक बार लगाने पर कई सालों तक पैदावार देती है l इससे निकलने वाले तेल की बाज़ार में अच्छी कीमत मिलती है, जिसका उपयोग साबुन, परफ्यूम, और हर्बल उत्पादों में होता है, जिससे किसानों की किस्मत बदल रही है। 

      छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड गौरेला- पेण्ड्रा-मरवाही जिला अधिकतर वनों से घिरा हुआ क्षेत्र है, जहाँ अधिकांश किसानों के पास कम खेती योग्य भूमि है। कई किसानों के पास तो एक एकड़ जमीन भी नहीं है। ऐसे किसान परिवार अपनी आजीविका के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी या बड़े शहरों में पलायन करने को मजबूर थे।

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     उल्लेखनीय है कि किसानों की इस स्थिति को देखते हुए वन मंत्री  ईटीवी भारत केदार कश्यप के निर्देशानुसार छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष  ईटीवी भारत विकास मरकाम के मार्गदर्शन में बोर्ड के द्वारा औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी के अंतर्गत लेमनग्रास की खेती को जिले में किसानों की आय बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से शुरू किया गया है।

किसान लगभग 230 एकड़ में कर रहे हैं लेमनग्रास की खेती

           बोर्ड द्वारा क्लस्टर मॉडल के माध्यम से किसानों को समूह में जोड़ा गया। लेमनग्रास की बुवाई से पहले ही किसानों का तेल क्रय करने वाले उद्योगों के साथ अनुबंध कराया गया। इन उद्योगों द्वारा बोरवेल, खेत की जुताई, पौधारोपण, फेंसिंग
तथा अन्य आवश्यक कार्यों के लिए अग्रिम वित्तीय सहायता दी गई। किसान फसल बेचने के बाद इस राशि को चरणबद्ध तरीके से वापस करते हैं साथ ही, बोर्ड द्वारा लेमनग्रास की स्लिप्स निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं और तेल निकालने के लिए आसवन संयंत्र (डिस्टिलेशन यूनिट) भी स्थापित किए गए। भविष्य में हर 50 किसानों पर एक संयंत्र स्थापित करने की योजना है। आज गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के 4 क्लस्टरों खरड़ी, पंडरी, अमारू और हरड़ी के 123 किसान लगभग 230 एकड़ में लेमनग्रास की खेती कर रहे हैं।

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एक बार लगाए गए पौधों से कई वर्षों तक मिलती है फसल

        गांव बहरी–जोरकी के किसान अगहन सिंह के पास केवल 35 डिसमिल (लगभग 1/3 एकड़) भूमि थी। कम जमीन होने के कारण उनकी आय सीमित थी। बोर्ड से प्रेरणा लेकर उन्होंने लेमनग्रास की खेती शुरू करने का फैसला किया। बोर्ड द्वारा उन्हें लेमनग्रास की स्लिप्स निःशुल्क प्रदान की गईं। लेमनग्रास की फसल केवल 4 महीने में तैयार हो जाती है। पहली कटाई में 4 लीटर तेल प्राप्त होता है जिसका बाजार मूल्य  1000 रुपए प्रति लीटर है जिससे कुल आय  4,000 रुपए होगी। इसी तरह दूसरी कटाई (अगले 4 महीने बाद) से 8 लीटर तेल प्राप्त होगा जिससे कुल आय 8,000 रुपये होगी। इस तरह किसान को एक वर्ष में कुल आय 12,000 रुपये और यह आय आने वाले 5 वर्षों तक लगातार मिलती रहेगी, क्योंकि एक बार लगाए गए पौधों से कई वर्षों तक फसल मिलती है।

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किसान लेमनग्रास की खेती से बन रहे हैं आत्मनिर्भर

          अगहन सिंह जैसे कई किसान आज लेमनग्रास की खेती से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इस मॉडल की खासियत यह है कि किसान शून्य बजट में खेती शुरू कर सकते हैं और उन्हें तत्काल आय मिलनी शुरू हो जाती है।

लेमनग्रास की खेती छोटे किसानों के लिए एक वरदान

        लेमनग्रास की खेती से किसानों की आय में वृद्धि, रोजगार के स्थानीय अवसर, पलायन में कमी और छोटे किसानों की आर्थिक मजबूती जैसे सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। गौरेला-पेण्ड्रा- मरवाही में यह कहना बिल्कुल उचित है कि लेमनग्रास की खेती छोटे किसानों के लिए एक वरदान बनकर उभर रही है।

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