वैभव सूर्यवंशी की मुश्किल परीक्षा, इंग्लैंड में सीख रहे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सबक

नई दिल्ली
वैभव अभी सिर्फ 15 साल के हैं.  इसलिए तीन पारियों के आधार पर उनके भविष्य का फैसला सुनाना जल्दबाजी होगी. क्रिकेट का इतिहास गवाह है कि प्रतिभा आपको पहचान दिला सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लंबी सफलता तकनीक, धैर्य और परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता से मिलती है. इंग्लैंड में वैभव अभी यही सबक सीख रहे हैं.

वैभव सूर्यवंशी आज भी भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक हैं. अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से उन्होंने रातोरात पहचान बनाई और सबसे कम उम्र में भारत के लिए खेलने का रिकॉर्ड अपने नाम करने के बाद उनसे उम्मीदें कई गुना बढ़ गईं.

… लेकिन क्रिकेट का सच यह है कि IPL आपको सुर्खियां और स्टारडम दे सकता है, जबकि इंग्लैंड जैसे कठिन दौरे यह तय करते हैं कि आप सिर्फ स्टार हैं या लंबे समय तक टीम इंडिया का भरोसेमंद बल्लेबाज बन सकते हैं.

दरअसल, क्रिकेट का सबसे बड़ा सच यह है कि IPL और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट दो अलग-अलग दुनिया हैं. खासकर तब, जब मुकाबला इंग्लैंड जैसी परिस्थितियों में हो, जहां बल्लेबाज का साहस नहीं, उसकी तकनीक, धैर्य और निर्णय लेने की क्षमता सबसे बड़ी परीक्षा से गुजरती है. वैभव अभी उसी परीक्षा से गुजर रहे हैं.

ये भी पढ़ें :  इंदौर पुलिस ने पकड़ा 50 पैसे का इनामी बदमाश, गर्लफ्रेंड के घर काट रहा था फरारी

इंग्लैंड ने दिखाया कि असली परीक्षा क्या होती है
भारतीय बल्लेबाजों के लिए इंग्लैंड हमेशा सबसे कठिन दौरों में रहा है. यहां नई गेंद लगातार हरकत करती है, उछाल अलग होती है और छोटी-सी तकनीकी गलती भी विकेट बन जाती है. यही वजह है कि दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाज भी यहां संघर्ष करते रहे हैं.

ऐसे में यह उम्मीद करना कि 15 साल का एक किशोर बल्लेबाज आते ही 35-40 गेंदों में शतक जड़ देगा, क्रिकेट की वास्तविकता से ज्यादा हमारी कल्पना थी.

महत्वपूर्ण यह भी है कि सिर्फ वैभव ही नहीं जूझ रहे हैं… पूरी भारतीय बल्लेबाजी लय में नहीं दिखी. अभिषेक शर्मा और कप्तान श्रेयस अय्यर को छोड़ दें तो लगभग सभी बल्लेबाज रन बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसलिए तीन पारियों का पूरा बोझ अकेले वैभव के कंधों पर डालना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक.

हर असफलता भविष्य की सबसे बड़ी 'कोच' होती है
क्रिकेट का इतिहास बताता है कि महान खिलाड़ी शुरुआत से महान नहीं होते.
सचिन तेंदुलकर की शुरुआत भी अच्छी नहीं रही थी. वह अपने पहले दो वनडे मैचों में लगातार शून्य पर आउट हुए थे. लेकिन बाद में वही खिलाड़ी 100 अंतरराष्ट्रीय शतक लगाने वाला दुनिया का पहला बल्लेबाज बना. इसलिए वैभव सूर्यवंशी का आकलन भी सिर्फ तीन पारियों से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि यह उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण सीख बन सकती है.

ये भी पढ़ें :  एशेज से पहले ऑस्ट्रेलिया को झटका, दिग्गज खिलाड़ी की उपलब्धता पर सस्पेंस, कमिंग्स ने बढ़ाई टेंशन

किसी भी बल्लेबाज के लिए सबसे अच्छा समय वह होता है, जब उसे जल्दी समझ आ जाए कि उसकी कमजोरियां क्या हैं. जितनी जल्दी आईना सामने आता है, सुधार की प्रक्रिया उतनी जल्दी शुरू होती है.

तकनीक से ज्यादा सोच बदलने की जरूरत
वैभव के खेल में सबसे ज्यादा चर्चा शॉर्ट-पिच गेंदों के खिलाफ कमजोरी की हो रही है. IPL के दौरान भी इस पर सवाल उठे थे. श्रीलंका की त्रिकोणीय सीरीज में भी यह कमजोरी दिखाई दी और इंग्लैंड में जोफ्रा आर्चर ने उसी कमजोरी को निशाना बनाया.

…लेकिन असली मुद्दा सिर्फ तकनीक नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हर गेंद पर हमला करना जरूरी नहीं होता. कई बार सबसे अच्छा शॉट गेंद को छोड़ देना होता है. कई बार बाउंसर के नीचे झुक जाना चौका लगाने से ज्यादा समझदारी होती है. चेस्टर-ली-स्ट्रीट में विल जैक्स के खिलाफ क्रीज छोड़कर स्टंप होना भी यही बताता है कि वैभव अभी परिस्थितियों के अनुसार बल्लेबाजी करना सीख रहे हैं. यही सीख उन्हें आगे एक बेहतर बल्लेबाज बनाएगी.

सबसे बड़ा फायदा- अब हाइप कम होगी
वैभव की इन तीन छोटी पारियों का सबसे सकारात्मक असर शायद स्कोरबोर्ड पर नहीं, बल्कि माहौल पर पड़ेगा.

ये भी पढ़ें :  बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के चौथे मुकाबले के चौथे दिन AUS की लीड 333 रनों की, लायन-बोलैंड ने किया नाक में दम

पिछले कुछ महीनों में उनके इर्द-गिर्द ऐसा शोर पैदा हो गया था कि टीम इंडिया का हर फैसला उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता हुआ दिखाई देने लगा. इसी माहौल में संजू सैमसन जैसे अनुभवी खिलाड़ी को बाहर करने के फैसले पर भी लगातार सवाल उठे. बहस शुरू हुई कि क्या टीम मैनेजमेंट ने भविष्य की तैयारी को प्राथमिकता दी या मौजूदा फॉर्म को?

अब यह दबाव स्वाभाविक रूप से कम होगा. टीम मैनेजमेंट भी अधिक संतुलित फैसले ले सकेगा और वैभव को भी हर पारी में खुद को साबित करने की मजबूरी महसूस नहीं होगी.

भारतीय क्रिकेट को भी सीखने की जरूरत
यह कहानी सिर्फ वैभव सूर्यवंशी की नहीं है. यह भारतीय क्रिकेट के उस दौर की कहानी है, जहां सोशल मीडिया किसी खिलाड़ी को कुछ महीनों में 'भविष्य का महानायक' बना देता है और तीन खराब पारियों के बाद उसी पर सवाल भी खड़े कर देता है.

15 साल के खिलाड़ी को सबसे ज्यादा जरूरत सुर्खियों की नहीं, समय की होती है. उसे तालियों से ज्यादा अभ्यास चाहिए. उसे तुलना से ज्यादा मार्गदर्शन चाहिए.

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment