दो तिहाई बहुमत से सिर्फ 6 सांसद दूर NDA, क्या मॉनसून सत्र में आगे बढ़ेगा परिसीमन का एजेंडा?

नई दिल्ली

मॉनसून सत्र से पहले बड़ा देश की राजनीति में पावर गेम खेला जा रहा है. शरद पवार की पार्टी ने लोकसभा में परिसीमन बिल का समर्थन करने के संकेत दिए हैं. अगर ऐसा हुआ तो फिर शरद पवार के 8 सांसदों से मोदी सरकार के लोकसभा में दो तिहाई बहुमत के मिशन को मजबूती मिलेगी। 

इंडिया गठबंधन की जिस एकता के दम पर राहुल गांधी ने अप्रैल में मोदी सरकार को संसद में हराने का दावा किया था क्या वो एकता मॉनसून सत्र शुरु होने से पहले तार-तार होने लगी है। 

TMC में टूट के बाद सबसे बड़ा सवाल ये था कि क्या शरद पवार और एमके स्टालिन की पार्टी का स्टैंड बदलेगा? 20 जुलाई को शुरू हो रहे मॉनसून सत्र से पहले शरद पवार को लेकर पहली बार पुख्ता संकेत मिला है कि शरद पवार की बेटी और पार्टी सांसद सुप्रिया सुले इशारा करती दिखीं कि परिसीमन बिल को NCP शरद गुट समर्थन कर सकता है।

अप्रैल में ये बिल संसद में गिर गया था क्योंकि मोदी सरकार दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई थी. लेकिन इस बिल पर शरद पवार की NCP सुर बदलती है तो सरकार के 2 तिहाई बहुमत के मिशन को नई ताकत मिल जाएगी। 

सुप्रिया सुले ने कहा कि NCP SP परिसीमन पर नया बिल के पेश होने के बाद उस पर फैसला करेगी, अगर सभी राज्यों में 50% सीटें बढ़ाई जातीं तो परिसीमन बिल पर सभी पार्टियों की सहमति बन सकती थी। 

मॉनसून सत्र से पहले बदला राजनीतिक माहौल
20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र से पहले राजनीतिक दलों के बीच बैठकों और रणनीति का दौर तेज हो गया है. इसी दौरान एनसीपी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले के बयान ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी परिसीमन विधेयक पर अंतिम फैसला नए बिल का मसौदा सामने आने के बाद करेगी. सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि सभी राज्यों में समान रूप से लगभग 50 प्रतिशत सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो इस प्रस्ताव पर व्यापक सहमति बनने की संभावना है. उनके इस बयान को सरकार के प्रति नरम रुख के तौर पर देखा जा रहा है। 

अप्रैल में नहीं मिल पाया था दो-तिहाई समर्थन
परिसीमन से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक अप्रैल 2026 में लोकसभा में पेश किया गया था. उस समय सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका और विधेयक पारित नहीं हो पाया. वोटिंग के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे. उस समय सदन में उपस्थित सांसदों की संख्या के आधार पर सरकार को 352 सांसदों का समर्थन चाहिए था, लेकिन विपक्ष की एकजुटता के कारण यह आंकड़ा हासिल नहीं हो सका। 

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सरकार पहले ही दे चुकी है 50 प्रतिशत सीट बढ़ाने का संकेत
अप्रैल में हुई बहस के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की थी. उन्होंने सदन में कहा था कि यदि सभी राज्यों में समान रूप से सीटें बढ़ाने पर सहमति बनती है, तो सरकार इस दिशा में सकारात्मक निर्णय लेने के लिए तैयार है. अब सुप्रिया सुले की ओर से लगभग इसी प्रकार की शर्त सामने आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार और एनसीपी के बीच इस मुद्दे पर सहमति बनने की संभावना बढ़ गई है। 

क्या शरद पवार बदल रहे हैं अपनी राजनीतिक रणनीति?
हाल के दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में हुई कई मुलाकातों ने भी चर्चाओं को हवा दी है. एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल की पहले शरद पवार और फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है. इसी दौरान दिल्ली में अमित शाह और एकनाथ शिंदे की बैठक भी हुई, जिसमें शिवसेना से जुड़े कई सांसद मौजूद रहे. इन घटनाओं के बाद एनसीपी के बदलते रुख को लेकर अटकलें और तेज हो गई हैं। 

अब नजर DMK के रुख पर
राजनीतिक समीकरणों में अब सबसे अधिक चर्चा तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके को लेकर हो रही है. लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं और यदि वह भी सरकार का समर्थन करती है तो परिसीमन विधेयक पारित कराने का रास्ता काफी आसान हो सकता है. जानकारी के मुताबिक सरकार अप्रैल के बाद से ही डीएमके के साथ संवाद बढ़ाने में लगी हुई है ताकि इस महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन पर व्यापक समर्थन जुटाया जा सके। 

कांग्रेस की बढ़ी चिंता
एनसीपी के संभावित समर्थन की चर्चाओं के बीच कांग्रेस के भीतर भी बेचैनी दिखाई दे रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने विपक्षी एकता बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया है. राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि शरद पवार सरकार के साथ किसी मुद्दे पर खड़े होते हैं, तो इसका असर पूरे INDIA गठबंधन की रणनीति पर पड़ सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार फिलहाल किसी गठबंधन परिवर्तन की बजाय अपनी पार्टी को राजनीतिक रूप से सुरक्षित रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। 

दो-तिहाई बहुमत का गणित कैसे बदलेगा?
लोकसभा में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने की है. पिछली बार मिले 298 समर्थन के आधार पर यदि सरकार फिर वही संख्या हासिल करती है और इसके साथ तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों, शिवसेना के नए सहयोगी सांसदों तथा एनसीपी (शरद गुट) का संभावित समर्थन जोड़ती है, तो सरकार बहुमत के लक्ष्य के काफी करीब पहुंच सकती है. यदि आगे चलकर डीएमके भी समर्थन देती है, तो आवश्यक संख्या और भी आसानी से पूरी हो सकती है. ऐसे में कुछ छोटे दलों की अनुपस्थिति या तटस्थ रहने की स्थिति भी सरकार के पक्ष में जा सकती है। 

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मानसून सत्र में परिसीमन बिल रहेगा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा
20 जुलाई 2026 से शुरू होने वाला मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक ताकत की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है. परिसीमन विधेयक को लेकर आने वाले दिनों में विभिन्न दलों का अंतिम रुख तय करेगा कि सरकार अपने दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य तक पहुंच पाती है या विपक्ष एक बार फिर संख्या बल के सहारे उसे रोकने में सफल रहता है. फिलहाल राजनीतिक संकेत यही बताते हैं कि संसद शुरू होने से पहले ही सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले कुछ दिन राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं। 

सुप्रिया सुले के सपोर्ट से NDA का कॉन्फिडेंस हाई
सुप्रिया सुले की ये शर्त पहले से सरकार मानने को तैयार है. आपको याद होगा कि विपक्ष का समर्थन जुटाने के लिए अप्रैल महीने में अमित शाह ने सदन के अंदर विपक्ष की इस चिंता को घंटेभर में दूर करने का ऑफर दिया था। 

अमित शाह ने पिछली बार की चर्चा के दौरान कहा था कि अगर 50 फीसदी सीटें बढ़ाने की बात है तो सदन को एक घंटे के लिए स्थगित करें इसे अभी कर दिया जाएगा।  

अप्रैल में मात खाने के बाद सरकार की तरफ से लगातार इस बिल को पास करवाने के लिए बहुमत जुटाया जा रहा है. इसीलिए परिसीमन जैसे अहम मुद्दे पर अगर INDIA गठबंधन में शामिल NCP का सत्र से पहले सरकार को समर्थन मिलता है तो ये काफी अहम बात होगी. क्योंकि शरद पवार को लेकर चर्चा यहां तक चल रही है कि वे NDA में शामिल हो सकते हैं. इसकी एक बड़ी वजह एनसीपी शरद गुट के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल का पहले शरद पवार और फिर देंवेंद्र फडणवीस से मिलना है। 

जयंत पाटिल देंवेंद्र फडणवीस से मिलते हैं तो दिल्ली में अमित शाह और एकनाथ शिंदे की मुलाकात होती है. इस दौरान शिवसेना UBT छोड़कर आए सभी 6 सांसद भी मौजूद रहे. और अगली सुबह शरद पवार की पार्टी परिसीमन बिल पर सरकार के करीब आती दिखी। 

दलबदल से कितना बदला राजनीतिक गणित?
एनडीए के पास पहले से 293 सांसदों का समर्थन था। हाल के दलबदल के बाद राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। सबसे बड़ा झटका तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को लगा, जहां 20 बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया और एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया।

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    वहीं, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसद बगावत कर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए। इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद लोकसभा में एनडीए की ताकत बढ़कर 318 से 319 सांसदों तक पहुंच गई है। हालांकि, दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी 360 के आंकड़े से गठबंधन अब भी 41 से 42 सांसद दूर है।

    सरकार बनाने के लिए 272 का आंकड़ा पर्याप्त है, लेकिन संविधान संशोधन जैसे बड़े विधेयकों के लिए, यदि सभी सदस्य मतदान करें, तो 362 वोट तक पहुंचना होगा। हालांकि, किसी भी संविधान संशोधन या प्रस्ताव को पारित करने के लिए 352 का जादुई आंकड़ा भी महत्वपूर्ण होता है। यह संख्या 'उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों' के आधार पर तय होती है। यही वजह है कि बीजेपी चुनावी जीत के साथ-साथ संसद में अपनी संख्या बढ़ाने की रणनीति पर भी काम कर रही है।

हालिया राजनीतिक बदलावों की बात करें, तो स्थिति इस प्रकार है:

    तृणमूल कांग्रेस (TMC): 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का दामन थामा और एनडीए को समर्थन देने का ऐलान किया।

    शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे): 6 लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए।

विपक्षी दलों में टूट से बदल रहा राजनीतिक गणित
हाल के महीनों में तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के कई सांसदों ने अपने दल छोड़ दिए। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से कुछ सांसद बीजेपी या उसके सहयोगी दलों के साथ चले गए, जबकि कुछ ने एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया। इन घटनाओं ने संसद में राजनीतिक समीकरण बदलने की चर्चा तेज कर दी है।

बीजेपी के लिए आगे की चुनौती क्या?
रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी की रणनीति दो मोर्चों पर आगे बढ़ने की है-एक तरफ चुनाव जीतकर सीटें बढ़ाना और दूसरी तरफ विपक्षी दलों से आने वाले सांसदों को अपने साथ जोड़ना। हालांकि दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य हासिल करना अभी भी आसान नहीं माना जा रहा। परिसीमन और 'एक देश, एक चुनाव' जैसे मुद्दों पर विपक्ष लगातार विरोध कर रहा है। ऐसे में आने वाले चुनाव और संसद के भीतर बदलता राजनीतिक गणित ही तय करेगा कि बीजेपी इस अहम आंकड़े तक पहुंच पाती है या नहीं।

 

 

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