NEET आंदोलन में परिवारों के विरोध के बावजूद जंतर-मंतर पहुंचे हजारों Gen Z युवा

नई दिल्ली
NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए विशाल प्रदर्शन में भाग लेने पहुंचे कई Gen Z युवाओं के लिए पहली लड़ाई दिल्ली में नहीं, बल्कि उनके अपने घरों में लड़ी गई थी. पटना साहिब से आए 21 वर्षीय ऋषभ और उनके साथियों ने अपने बीजेपी समर्थक परिवारों के कड़े विरोध के बावजूद दिल्ली का रुख किया.

20 जुलाई के पुलिस लाठीचार्ज के बाद उग्र हुए इस आंदोलन ने हजारों युवाओं को आकर्षित किया, जिनमें से कई ने अपने परिवारों की राजनीतिक विचारधारा से अलग हटकर अपने भविष्य के लिए आवाज उठाई और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.

बीजेपी समर्थक पिता से विवाद
बिहार के पटना साहिब के रहने वाले 21 वर्षीय ऋषभ जब जंतर-मंतर पहुंचे तो उनके दाहिने हाथ पर पट्टी बंधी हुई थी. उन्होंने बताया कि ये चोट पुलिस कार्रवाई में नहीं, बल्कि उनके पिता के साथ हुए झगड़े में लगी थी. उनके पिता भारतीय जनता पार्टी के कट्टर समर्थक हैं और वो ऋषभ के दिल्ली जाने के पूरी तरह खिलाफ थे. पिता के धकेलने पर ऋषभ को चोट लगी, लेकिन वह अपने तीन चचेरे भाइयों शिवम, संकेत और निशांत के साथ दिल्ली आ गए.

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ऋषभ के चचेरे भाई शिवम ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि उनके परिवारों में बीजेपी सिर्फ एक राजनीतिक पसंद नहीं, बल्कि परिवार की पहचान का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक यानी 'भक्त' हैं. दूसरी ओर, लल्लनटॉप के कार्यकारी संपादक कुलदीप मिश्रा ने भी 'नेतानगरी' शो में जिक्र किया था कि एक बीजेपी विधायक की बेटी ने भी इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया था और इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर की थी, जिसे बाद में हटा दिया गया था.

पुलिस नहीं परिवार के डर से पहना मास्क
प्रदर्शन स्थल पर बिहार के 22 वर्षीय बीसीए स्नातक आनंद जैसे कई छात्र मास्क पहनकर शामिल हुए. आनंद ने बताया कि वो पुलिस के डर से नहीं, बल्कि अपने बीजेपी समर्थक माता-पिता की पहचान से बचने के लिए मास्क पहन रहे थे. आनंद के माता-पिता लगातार फोन करके उन्हें जंतर-मंतर से दूर रहने की हिदायत दे रहे थे, लेकिन आनंद का मानना था कि ये लड़ाई उनके अपने भविष्य से जुड़ी है.

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परिवार से छिपकर प्रदर्शन में पहुंचे
दिल्ली के रहने वाले हिमांशु शर्मा ने भी अपने परिवार से छिपकर प्रदर्शन में हिस्सा लिया. उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता कट्टर बीजेपी समर्थक हैं और उन्होंने घर पर बताए बिना यहां कदम रखा है. हिमांशु ने कहा कि उनके माता-पिता के गलत पार्टी को समर्थन देने के फैसले की वजह से ही आज उन्हें सडकों पर उतरना पड़ा है. वहीं, उनके दोस्तों अंकित और साकिब ने बताया कि उनके परिवारों को उनके प्रदर्शन में शामिल होने से कोई आपत्ति नहीं थी.

जंतर-मंतर पर हर कहानी सिर्फ टकराव की नहीं थी. दिल्ली के बाइपास इलाके की रहने वाली अर्पणा के पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े हैं. अर्पणा को लगा था कि उन्हें अनुमति नहीं मिलेगी, लेकिन उनके पिता ने कहा कि विरोध करना उनका अधिकार है और उन्हें सुरक्षित रहकर अपनी बात रखनी चाहिए. वहीं, दूसरी ओर 19 वर्षीय सुहानी ने बताया कि पीएम मोदी को पसंद करने वाले उनके परिवार को बिना बताए ही वो इस आंदोलन का हिस्सा बनी हैं.

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दरअसल, सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी से उपजे कॉकरोच जनता पार्टी संगठन ने अभिजीत दिपके के नेतृत्व में ये आंदोलन शुरू किया था. सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के 26 दिनों के अनशन ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया. 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) द्वारा लाठीचार्ज, पेलेट गन और आंसू गैस के इस्तेमाल के बाद छात्रों का गुस्सा बेहद बढ़ गया और जंतर-मंतर पर भारी भीड़ जमा हो गई.

जंतर-मंतर पर जुटे हजारों युवाओं की अपनी-अपनी कहानियां थीं. कोई घर की लड़ाई के निशान लेकर पहुंचा था तो कोई TV रिपोर्टों और रील्स में पहचाने जाने के डर से चेहरे पर मास्क लगाए हुए था. कइयों के फोन घर से लगातार बज रहे थे. इन सभी युवाओं के लिए सबसे बड़ी परीक्षा जंतर-मंतर पर नहीं, बल्कि अपने ही घरों में अपने 'भक्त' परिजनों के खिलाफ जाकर अपनी आवाज बुलंद करने की थी.

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