100% हाइड्रोजन से चला विमान इंजन, भारत में भी नई तकनीक की टेस्टिंग; पेट्रोल-डीजल से कितना अलग है ये ईंधन?

बेंगलुरु 

देश की नामी सॉफ्टवेयर कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज यानी टीसीएस और रोल्स-रॉयस ने 100 फीसदी हाइड्रोजन चलने वाले विमान इंजन का परीक्षण किया है. इस दौरान एक एडवांस विमान गैस टर्बाइन इंजन को उड़ान के पूरे चक्र में चलाया गया. इस परीक्षण के लिए उड़ान भरने, ऊंचाई पर उड़ने और उतरने जैसी स्थितियों को एक प्रयोगशाला में तैयार किया गया था. इस परीक्षण की तैयारी चार साल से चल रही थी. इस परीक्षण का मकसद यह पता लगाना है कि क्या हाइड्रोजन को भविष्य में विमान में बतौर ईंधन यूज किया जा सकता है या नहीं. खास बात यह है कि इस परीक्षण में फ्यूल में कुछ मिलाया नहीं गया था. यानी पूरी तरह 100 फीसदी हाइड्रोजन पर इंजन को चलाया गया। 

100% हाइड्रोजन से इंजन में क्या हुआ?
रोल्स-रॉयस और टीसीएस ने जिस इंजन का परीक्षण किया, उसमें हाइड्रोजन के इस्तेमाल के लिए जरूरी बदलाव किए गए थे. इसके बाद इसे उड़ान के अलग-अलग चरणों की परिस्थितियों में चलाया गया. टेकऑफ के दौरान इंजन की जरूरत अलग होती है. क्रूज यानी लगातार उड़ान के दौरान अलग. वहीं उतरते समय ईंधन और इंजन नियंत्रण की जरूरत फिर बदल जाती है। 

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इस परीक्षण में इन सभी चरणों को शामिल किया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि हाइड्रोजन से चलने वाला विमान यात्रियों को लेकर उड़ान भर चुका है. फिलहाल यह इंजन तकनीक के परीक्षण का चरण है. असली विमान में इसे इस्तेमाल करने से पहले कई और परीक्षण करने होंगे. टीसीएस ने इस परियोजना में ईंधन प्रणाली, इंजन नियंत्रण, हाइड्रोजन को जलाने, परीक्षण, आंकड़ों के विश्लेषण और डिजाइन जैसे क्षेत्रों में रोल्स-रॉयस की मदद की। 

हाइड्रोजन इतना खास क्यों है?
हाइड्रोजन को भविष्य के स्वच्छ ईंधन के तौर पर देखा जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि हाइड्रोजन को जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड सीधे तौर पर पैदा नहीं होती. इसके मुकाबले पारंपरिक विमानन ईंधन पेट्रोलियम आधारित होता है. उसके जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है. विमानन क्षेत्र बड़ी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन करते हैं. इसलिए इस क्षेत्र के लिए ऐसा ईंधन तलाशना जरूरी है जो उत्सर्जन कम कर सके. यही वजह है कि हाइड्रोजन पर दुनियाभर में शोध हो रहा है। 

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क्या हाइड्रोजन पेट्रोल-डीजल से ज्यादा पावरफुल है?
यहां थोड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है. हाइड्रोजन को सिर्फ पेट्रोल या डीजल की तरह ‘ज्यादा पावरफुल’ कहना सही नहीं होगा. हाइड्रोजन का वजन बहुत कम है. प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन में पेट्रोल या डीजल की तुलना में काफी ज्यादा ऊर्जा होती है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन समस्या दूसरी जगह है. हाइड्रोजन बहुत हल्की गैस है. इसलिए समान मात्रा में ऊर्जा रखने के लिए इसे बहुत बड़े टैंक की जरूरत पड़ सकती है. इसे बेहद कम तापमान पर तरल बनाकर रखा जा सकता है या बहुत अधिक दबाव में गैस के रूप में संग्रहित किया जा सकता है. विमान के मामले में यह चुनौती बहुत बड़ी है. विमान में हर किलो वजन महत्वपूर्ण होता है. इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि ईंधन में कितनी ऊर्जा है. यह भी देखना होगा कि उस ईंधन को विमान में कितनी जगह और कितने वजन के साथ रखा जा सकता है। 

विमान में हाइड्रोजन का इस्तेमाल मुश्किल क्यों?
यही हाइड्रोजन विमान की सबसे बड़ी चुनौती है. आज के विमान अपेक्षाकृत छोटे टैंकों में बड़ी मात्रा में विमानन ईंधन ले जा सकते हैं. हाइड्रोजन को उसी तरीके से रखने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत पड़ सकती है. तरल हाइड्रोजन को लगभग -253 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना पड़ता है. इसका मतलब है कि विमान में विशेष टैंक और ताप नियंत्रण प्रणाली की जरूरत होगी. सिर्फ टैंक बदलने से काम नहीं चलेगा. इंजन की ईंधन प्रणाली में बदलाव करना होगा. हाइड्रोजन का दहन पारंपरिक विमानन ईंधन से अलग होता है. इससे इंजन के तापमान, दहन स्थिरता और नियंत्रण से जुड़े नए सवाल पैदा होते हैं। 

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क्या अब हाइड्रोजन विमान जल्द उड़ने लगेगा?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. 100 फीसदी हाइड्रोजन पर इंजन का परीक्षण सफल होना एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि जरूर है. लेकिन इंजन परीक्षण और व्यावसायिक यात्री विमान के बीच लंबा रास्ता है. अगले चरण में सुरक्षा, ईंधन भंडारण, विमान के डिजाइन, वजन, लागत, हाइड्रोजन की उपलब्धता और हवाई अड्डों पर ईंधन भरने की व्यवस्था जैसे सवालों का समाधान करना होगा। 

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