सीकर
राजस्थान में नशे के कारोबार पर शिकंजा कसने के लिए अब तीन साल की नई रणनीति तैयार होगी। अफीम, डोडा-पोस्त और एमडी की जब्ती में देश में पहले स्थान पर पहुंचे प्रदेश में सरकार नारकोटिक्स कंट्रोल विजन 2026-29 तैयार कर रही है।
नारकोटिक्स विभाग का पूरा ध्यान मादक पदार्थ पकड़ने और तस्करों को गिरफ्तार करने तक नहीं रहेगा, विभाग की ओर से सिंथेटिक ड्रग के निर्माण, उसकी सप्लाई चेन, ड्रग की मांग कम करने और नशे की चपेट में आए लोगों को इलाज व पुनर्वास से जोड़ने पर भी रहेगा।
प्रदेश में एक साल में अब तक करीब 730 करोड़ रुपए के मादक पदार्थ जब्त हो चुके हैं। एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने 93 ड्रग किंगपिन ( अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी के बड़े नेटवर्क और संगठनों का मालिक या संचालक) गिरफ्तार किए हैं और एमडी ड्रग बनाने वाली 34 फैक्ट्रियों का भंडाफोड़ किया है।

5,626 केस दर्ज, अब दोहराने वाले अपराधियों पर भी नजर
मादक पदार्थों की तस्करी और बिक्री के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत अब तक 5,626 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। बार-बार अपराध करने वाले आरोपियों को चिन्हित कर उनके खिलाफ पीआईटी एनडीपीएस एक्ट ( प्रिवेंशन ऑफ इललिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1988 ) के तहत कार्रवाई की जा रही है।
प्रदेश में 73 करोड़ 64 लाख 64 हजार 948 रुपए की चल-अचल संपत्तियां कुर्क, फ्रीज और सीज की गई हैं। कार्रवाई में मकान, दुकान, कृषि भूमि, आवासीय भूखंड और कार, पिकअप, ट्रैक्टर व मोटरसाइकिल सहित विभिन्न संपत्तियां शामिल हैं। चित्तौड़गढ़ में 20.35 करोड़, बारां में 18.48 करोड़, झालावाड़ में 12.65 करोड़ और प्रतापगढ़ में 8.24 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर कार्रवाई हुई है। नागौर, जोधपुर ग्रामीण व हनुमानगढ़ में भी 3.05 करोड़ रुपए की संपत्तियां कुर्क की गई हैं।
चार मोर्चों पर चलेगा अभियान
नए विजन में ड्रग के खिलाफ कार्रवाई को चार प्रमुख हिस्सों में रखा जाएगा। इसमें प्रवर्तन, आसूचना एवं अभियान, प्रिकर्सर व सिंथेटिक ड्रग नियंत्रण, मांग एवं हानि न्यूनीकरण,क्षमता निर्माण, समन्वय एवं निगरानी शामिल हैं। खासतौर पर एमडी (मेथिलीन डाइऑक्सी मेथैम्फेटामाइन) जैसी सिंथेटिक ड्रग के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्रिकर्सर पदार्थों की निगरानी बढ़ाई जाएगी।
इसके लिए प्रदेश के 12 सर्वाधिक संवेदनशील जिलों को विशेष निगरानी में रखा गया है। इन जिलों में नशामुक्ति शिविर लगाए जा रहे हैं और ड्रग हॉटस्पॉट पर निगरानी मजबूत की जा रही है। वहीं, शैक्षणिक संस्थानों के आसपास 500 मीटर के दायरे को ड्रग-फ्री बनाने के लिए भी अभियान चलाया जा रहा है।
ड्रग पकड़ने के बाद वैज्ञानिक जांच जरूरी
मादक पदार्थों के मामलों में फॉरेंसिक जांच को भी मजबूत किया जाएगा। ड्रग की पहचान, उसके स्रोत और नेटवर्क तक पहुंचने में वैज्ञानिक जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य और जिला स्तर पर नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर (एनकार्ड) की नियमित बैठकें कर पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग सहित संबंधित विभागों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ाया जाएगा।
इनका कहना है
पुलिस की कार्रवाई केवल एक मामले में गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहेगी, ड्रग के कारोबार में लगातार सक्रिय रहने वालों पर लंबी अवधि तक शिकंजा कसा जाएगा।नशे का कारोबार करने वाले मुख्य सप्लायर और तस्करी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अभियान चलाकर नशे का उपभोग करने वालों को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरुक किया जाएगा।
