मिडिल ईस्ट से स्कैंडिनेविया तक भारत की गुप्त मौजूदगी? विदेशों में बन रहे स्टेशन, दुश्मन पर रहेगी पैनी नजर

नई दिल्ली
भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए अंतरिक्ष-आधारित निगरानी प्रणाली का बड़े पैमाने पर विस्तार करने जा रहा है। इस योजना के तहत 50 से अधिक नए जासूसी सैटेलाइट जल्द लॉन्च किए जाएंगे, जिनमें रात और बादलों के बीच भी साफ तस्वीरें लेने की क्षमता होगी। इस फैसले के पीछे पिछले साल पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान सामने आई निगरानी संबंधी कमियां प्रमुख वजह बताई जा रही हैं।
 
ब्लूमबर्ग ने मामले से परिचित लोगों के हवाले से लिखा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार विदेशों में ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की भी योजना पर काम कर रही है। संभावित स्थानों में मध्य पूर्व, दक्षिण-पूर्व एशिया और स्कैंडिनेवियाई देश शामिल हैं। इन स्टेशनों से सैटेलाइट से मिलने वाली सूचनाओं को तेज और व्यापक तरीके से रिले किया जा सकेगा, हालांकि इसके लिए मेजबान देशों की मंजूरी जरूरी होगी।

रात और खराब मौसम में भी निगरानी
भारत अपने मौजूदा सैटेलाइटों में भी तकनीकी अपग्रेडेशन करने जा रहा है। इसके तहत इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम से आगे बढ़ते हुए सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) तकनीक अपनाई जाएगी, जो अंधेरे और बादलों जैसी परिस्थितियों में भी हाई-रिजॉल्यूशन इमेज कैप्चर करने में सक्षम है। इसके अलावा, सैटेलाइटों के बीच सीधे डेटा ट्रांसफर (इंटर-सैटेलाइट लिंक) की व्यवस्था विकसित की जा रही है, ताकि हर बार ग्राउंड स्टेशन पर निर्भर न रहना पड़े।

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स्पेस-बेस्ड सर्विलांस-3 पर फोकस
सूत्रों के मुताबिक, स्पेस-बेस्ड सर्विलांस-3 (SBS-3) कार्यक्रम के तहत पहले चरण में 52 सैटेलाइट को तेजी से लॉन्च करने की तैयारी है। पहला बैच अप्रैल तक अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है। इस प्रणाली से भारत उन संवेदनशील क्षेत्रों पर कहीं ज्यादा बार नजर रख सकेगा, जहां मौजूदा तकनीक के चलते निगरानी अंतराल कई दिनों का होता है। यानी उस जगह की जानकारी जुटाने में कई दिन लग जाते हैं।

इससे पहले मिंट ने अप्रैल में इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन, यानी ISRO के चेयरमैन वी. नारायणन के चेन्नई में एक इवेंट में दिए बयान का हवाला देते हुए बताया था कि भारत अपनी सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 150 नए सैटेलाइट तैनात करने की योजना बना रहा है। उन्होंने बताया कि 150 सैटेलाइट को लॉन्च करने की अनुमानित लागत लगभग 260 बिलियन रुपये (2.8 बिलियन डॉलर) है।

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हालिया संघर्ष से मिली सीख
ये व्यापक कदम मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए चार दिन के सैन्य टकराव से मिले सबक को भी दर्शाते हैं। उस दौरान लक्ष्य पहचान और निगरानी में सैटेलाइट की अहम भूमिका रही। रक्षा मंत्रालय से जुड़े एक रिसर्च समूह ने पिछले साल कहा था कि चीन ने पाकिस्तान को सैटेलाइट कवरेज देने में मदद की थी। स्पेसक्राफ्ट ट्रैकर N2YO.com के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के पास इस समय 100 से अधिक सैटेलाइट कक्षा में हैं, जबकि पाकिस्तान के पास महज आठ सैटेलाइट हैं। हालांकि अभी भारत के सैटेलाइट रात और बादलों में निगरानी करने में सीमित क्षमता रखते हैं।

निगरानी अंतराल होगा कुछ घंटों का
फिलहाल किसी क्षेत्र की दोबारा निगरानी में कई दिनों का अंतराल आ जाता है। इसी कारण भारत को पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ अभियानों की योजना बनाने के लिए अमेरिका की निजी कंपनियों से सैटेलाइट डेटा खरीदना पड़ा। नए जासूसी सैटेलाइट की तैनाती से यह अंतराल घटकर कुछ घंटों का रह सकता है।

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रॉकेट लॉन्च में चुनौतियां और निजी क्षेत्र की भूमिका
इन सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए ISRO अपने मौजूदा रॉकेटों का इस्तेमाल करेगा। हालांकि, हाल के महीनों में एजेंसी को सफलता और असफलता दोनों का सामना करना पड़ा है। इस महीने एक रॉकेट लॉन्च विफल रहा- पिछले एक साल में यह दूसरी ऐसी घटना थी। इसके बावजूद, ISRO ने 24 दिसंबर को अमेरिकी कंपनी AST SpaceMobile के BlueBird Block-2 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया था।

सरकार की इस व्यापक अंतरिक्ष निगरानी रणनीति में निजी स्टार्टअप्स भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। Skyroot Aerospace Pvt. जैसी कंपनियां भारत की स्पेस-बेस्ड मॉनिटरिंग क्षमताओं को मजबूत करने और सरकारी प्रयासों को समर्थन देने के लिए आगे आ रही हैं। कुल मिलाकर, भारत का यह आक्रामक अंतरिक्ष विस्तार न केवल सीमा सुरक्षा को नई धार देगा, बल्कि भविष्य के सैन्य और रणनीतिक परिदृश्य में उसकी स्थिति को भी कहीं अधिक मजबूत बनाएगा।

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