गणगौर व्रत की कथा: माता पार्वती को इस व्रत से मिला था अद्भुत फल, जानें पूरी कहानी

हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन गणगौर का व्रत रखा जाता है. इस साल 21 मार्च को ये व्रत रखा जाएगा. गणगौर दो शब्दों गण और गौर से मिलकर बना है. गण का अर्थ भगवान शिव है और गौर माता पार्वती को कहा जाता है. ये व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित किया गया है. सुहागिन महिलाएं गणगौर का व्रत करती हैं. प्रमुख तौर पर राजस्थान और हरियाणा समेत उत्तर भारतीय राज्यों में गणगौर व्रत किया जाता है.

हिंदू मान्यता है कि गणगौर का व्रत रखने और विधि-विधान से शिव और पार्वती की पूजा करने से पति की उम्र लंबी होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है. अविवाहित कन्याएं भी गणगौर का व्रत रखती हैं. मान्यता ये भी है कि इस व्रत को रखने से मनचाहा वर प्राप्त होता है, लेकिन आइए जानते हैं कि गणगौर का व्रत करने से माता पार्वती को कौन सा फल मिला था? साथ ही जानते हैं इस व्रत की कथा.

पार्वती को शिव मिले
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने गणगौर का व्रत किया था. उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी. तप के साथ-साथ उन्होंने ये व्रत भी किया था. तभी से गणगौर व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है. माना जाता है कि गणगौर व्रत के फल स्वरूप से ही देवों के देव महादेव देवी पार्वती को पति रूप में प्राप्त हुए.

ये भी पढ़ें :  टॉम हॉलैंड की 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे' का बेसब्री से इंतजार, ऑनलाइन लीक हुई डिटेल

गणगौर व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नारद मुनि के साथ भ्रमण पर निकले. चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि के दिन एक गांव में पहुंचे. वहां की गरीब महिलाओं ने श्रद्धा के साथ माता पार्वती का पूजन किया. माता पार्वती ने उनकी भक्ति और पूजन से प्रसन्न होकर उनको अटल सौभाग्य का आशीर्वाद दिया. इसके बाद गांव की अमीर महिलाएं सोने-चांदी की थालियों में पकवान लेकर आईं.

उस समय माता ने उन महिलाओं पर प्रसन्न होकर अपनी उंगली से रक्त की कुछ बूंदें उन पर छिड़ दीं और उनको स्वयं जैसी सौभाग्यवती बनने का आशीर्वाद दे दिया. इसके बाद पार्वती जी नदी में स्नान करने चली गईं. वहां उन्होंने बालू मिट्टी से शिव जी की प्रतिमा बनाई और पूजा की. तब शिव जी प्रकट हुए और माता पार्वती से कहा कि जो स्त्री इस दिन तुम्हारी तरह मेरा पूजन और व्रत करेगी, उसके पति की आयु लंबी होगी.

ये भी पढ़ें :  तमिल सिनेमा को बड़ा झटका: अभिनेता मदन बॉब का 71 वर्ष की उम्र में निधन

पूजा करते हुए माता पार्वती को आने में देरी हो गई. जब वो शिव जी के पास पहुंची तो उन्होंने माता से देरी की वजह पूछी. इस पर माता पार्वती ने बताया कि उनको उनके भाई-भाभी मिले और दूध-भात खाने के लिए दिया, जिसमें समय लग गया. यह सुनकर शिव जी को भी वहां जाने का मन हुआ. फिरपार्वती जी ने मन ही मन भगवान शिव से उनकी लाज बचाने की प्रार्थना की.

इसके बाद जब वे नदी तट पर पहुंचे, तो वहां एक मायावी महल नजर आया. वहां शिव-पार्वती का खूब आदर-सत्कार हुआ. वो तीन दिन महल में रहे. शिव जी का मन महल में ही रहने का था, लेकिन पार्वती जी चल पड़ीं तो उनको भी माता के पीछे आना पड़ा. रास्ते में भगवान शिव को याद आया कि वो महल में अपनी माला भूल आए हैं. माला लाने के लिए उन्होंने नारद जी को भेजा.

ये भी पढ़ें :  बैन के बावजूद पाकिस्तान में छाया ‘धुरंधर’, अंडरग्राउंड सुपरहिट बनी फिल्म, ISI भी रह गई हैरान

नारद जी ने वहां जाकर देखा तो कोई महल नहीं था. बस पेड़ पर एक माला लटकी पड़ी थी. यह देखकर नारद जी हैरान रह गए.फिर नारद जी माला लेकर शिवजी के पास गए. माला देकर उन्होंने शिव जी से कहा कि प्रभु यह कैसी माया है जब मैं माला लेने गया तो वहां पर भवन नहीं था. इस पर शिव पार्वती मुस्कुराए और बोले कि यह सब तो देवी पार्वती की माया थी.

इस पर देवी पार्वती ने कहा कि यह मेरी नहीं भोलेनाथ की माया थी. इसके बाद नारद जी ने कहा कि आप दोनों की माया को आपके अलावा को दूसरा नहीं समझ सकता. आप दोनों की जो भक्ति भाव से पूजा करेगा, उसके जीवन में भी आपकी तरह प्रेम बना रहेगा.

Share

Leave a Comment