₹6.5 लाख करोड़ डूबे! इतना पैसा पाकिस्तान के पूरे साल के बजट के बराबर, Meta का मेटावर्स हुआ फेल

 नई दिल्ली

Meta ने अपने मेटावर्स प्लेटफॉर्म Horizon Worlds को लेकर बड़ा फैसला लिया है. कंपनी अब इसे बंद करने जा रही है. साथ ही वीआर एक्सपीरियंस पर नए इन्वेस्टमेंट और डेवलपमेंट को भी लिमिट किया जा रहा है। 

यह फैसला सिर्फ एक प्रोडक्ट बंद करने का नहीं है, बल्कि यह इस बात का इशारा है कि Meta धीरे-धीरे अपने उसी मेटावर्स विजन से पीछे हट रही है, जिसे कभी मार्क जकबरबर्ग इंटरनेट का फ्यूचर बताया गया था। 

मेटावर्स को फ्यूचर बता कर जकरबर्ग ने Facebook को Meta कर दिया

साल 2021 में फेसबुक सीईओ मार्क जकरबर्ग ने दुनिया को बताया था कि सोशल मीडिया का दौर खत्म होने वाला है और अगला मेटावर्स अगला बड़़ा प्लेटफॉर्म होगा. मेटावर्स यानी एक वर्चुअल दुनिया । 

हाइप इतनी बनी की मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक का नाम बदलकर Meta कर दिया गया. यह टेक इंडस्ट्री में एक बड़ा मोड़ था. पहली बार किसी बड़ी कंपनी ने खुले तौर पर कहा कि वह इंटरनेट के अगले रूप को खुद बनाएगी । 
उस समय यह सिर्फ एक कंपनी का फैसला नहीं था, बल्कि पूरी इंडस्ट्री के लिए एक सिग्नल था. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, ऐपल, सबने इस दिशा में काम तेज कर दिया. वर्चुअल रियलिटी, ऑगमेंटेड रियलिटी और डिजिटल दुनिया को लेकर एक नई दौड़ शुरू हो गई। 

पांच साल बाद अब तस्वीर बिल्कुल अलग है
Meta धीरे-धीरे अपने उसी मेटावर्स विजन से पीछे हटती दिख रही है. Horizon Worlds, जिसे कंपनी ने अपने वर्चुअल सोशल प्लेटफॉर्म के रूप में पेश किया था, वह उम्मीद के मुताबिक नहीं चला. अब कंपनी वर्चुअल रिएलिटी पर फोकस कम कर रही है और मोबाइल और AI पर ज्यादा ध्यान दे रही है। 

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यह सिर्फ एक प्रोडक्ट का फेल होना नहीं है. यह उस पूरे आइडिया की कमजोरी दिखाता है, जिसे इंटरनेट का भविष्य बताया गया थ। 

80 अरब डॉलर का दांव, लेकिन यूजर नहीं आए
Meta ने अपने Reality Labs डिवीजन के जरिए मेटावर्स पर 80 से 85 अरब डॉलर तक खर्च कर दिए. इसमें वीआर हेडसेट्स, सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म, चिप डिजाइन, डेटा सेंटर, और डेवलपर टूल्स तक सब शामिल था। 

इतना बड़ा निवेश करने के बाद भी कंपनी उस स्तर का यूजर एडॉप्शन नहीं ला पाई, जो इस पूरे मॉडल को टिकाऊ बना सके। 

Horizon Worlds पर एक्टिव यूजर्स की संख्या लाखों में ही सीमित रही. कई रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि ज्यादातर यूजर्स प्लेटफॉर्म पर कुछ ही समय के लिए आते थे और फिर वापस नहीं लौटते थे. यानी यूजर रिटेंशन में फेल हो गए। 

टेक इंडस्ट्री में किसी भी प्लेटफॉर्म की सफलता सिर्फ यूजर्स से नहीं, बल्कि उनके बार-बार लौटने से तय होती है. मेटावर्स इस कसौटी पर कमजोर साबित हुआ। 

टेक्नोलॉजी तैयार नहीं थी, या यूजर तैयार नहीं थे?
मेटावर्स की असफलता को समझने के लिए यह सवाल जरूरी है. पहली नजर में लगता है कि समस्या टेक्नोलॉजी की थी. वीआर (VR) हेडसेट अभी भी महंगे हैं, भारी हैं, और लंबे समय तक पहनना आसान नहीं है. बैटरी लाइफ लिमिटेड है, और हाई क्वालिटी ग्राफिक्स के लिए ज्यादा कंप्यूटिंग पावर चाहिए। 

लेकिन असली समस्या इससे भी गहरी है. यूजर्स को जरूरत ही महसूस नहीं हुई. लोग अपने फोन और लैपटॉप पर पहले से ही सोशल मीडिया, गेमिंग और वीडियो कॉल कर रहे हैं. मेटावर्स ने इन्हीं चीजों को एक नए फॉर्म में पेश किया, लेकिन ऐसा कुछ नया नहीं दिया जो लोगों को मजबूर करे कि वे अपनी आदतें बदलें
यही वजह है कि मेटावर्स एक ऐसी टेक्नोलॉजी बन गया, जो मौजूद तो थी, लेकिन जरूरी नहीं थी.

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मेटावर्स कोनॉमी का सपना भी नहीं चला
Meta का प्लान था कि मेटावर्स के अंदर एक पूरी डिजिटल इकोनॉमी बनेगी. लोग वर्चुअल जमीन खरीदेंगे, डिजिटल सामान लेंगे, और क्रिएटर्स पैसे कमाएंगे। 

लेकिन यह मॉडल भी जमीन पर नहीं उतर पाया. यूजर्स के पास ऐसा कोई ऐसी वजह नहीं थी कि वे वर्चुअल चीजों पर पैसा खर्च करें। 

जहां गेमिंग में लोग पैसे खर्च करते हैं, वहां भी एक स्ट्रॉन्ग गेम प्ले और कम्युनिटी होती है. मेटावर्स में वह दोनों चीजें कमजोर थीं. क्रिएटर्स के लिए भी कमाई का रास्ता साफ नहीं था, जिससे पूरा इकोसिस्टम धीमा पड़ गया। 

फेसबुक से Meta बनना: एक बड़ा जोखिम
जब फेसबुक ने अपना नाम बदलकर Meta किया, तब उसने अपने फ्यूचर को एक ही डायरेक्शन  में बांध दिया. यह एक साहसी बोल्ड मूव था, लेकिन रिस्की भी था। 

कंपनी ने अपने मेन बिजनेस, जैसे विज्ञापन और सोशल प्लेटफॉर्म, से ध्यान हटाकर एक लंबे समय वाले विजन पर ज्यादा खर्च करना शुरू किया. इससे इन्वेस्टर्स का भरोसा डगमगाया और कंपनी को कई बार अपनी स्ट्रैटिजी भी बदलनी पड़ी। 

बाद में Meta को लागत कम करनी पड़ी, कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी और नए फोकस की तलाश करनी पड़ी। 

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने  पूरा खेल बदल दिया
2022 के बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने टेक इंडस्ट्री का फोकस पूरी तरह बदल दिया. जहां मेटावर्स को भविष्य माना जा रहा था, वहीं एआई ने तुरंत असर दिखाया. कंटेंट बनाना, ऑटोमेशन, कोडिंग, कस्टमर सर्विस और हर जगह एआई का इस्तेमाल बढ़ गया। 

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कंपनियों को यहां तुरंत फायदा दिखा, जबकि मेटावर्स में फायदा दूर का सपना था. Meta ने भी यह बदलाव समझा और अब वह तेजी से एआई पर काम कर रहा है. इससे साफ है कि कंपनी ने अपनी प्रायॉरिटी बदल दी है। 

क्या मेटावर्स को खत्म समझा जाए? 
मेटावर्स पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उसका बड़ा सपना फिलहाल रुक गया है. अब जो दिशा दिख रही है, वह ज्यादा प्रैक्टिकल है। पूरी वर्चुअल दुनिया बनाने के बजाय, अब कंपनियां असली दुनिया में डिजिटल चीजें जोड़ने पर काम कर रही हैं. ऑगमेंटेड रियलिटी, एआई और मोबाइल बेस्ड एक्सपीरिएंस इस डायेरक्शन में आगे बढ़ रहे हैं। 

गेमिंग, ट्रेनिंग और कुछ खास इंडस्ट्री में मेटावर्स का इस्तेमाल जारी रहेगा, लेकिन यह आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा अभी नहीं बन पाया है। 

Meta ने क्या खोया, क्या पाया?
Meta ने इस पूरे एक्सपेरिमेंट में बहुत बड़ा पैसा खोया, समय खोया और कुछ हद तक भरोसा भी खोया. लेकिन इसके साथ ही कंपनी ने बहुत कुछ सीखा भी. वीआर और एआर टेक्नोलॉजी में उसकी पकड़ मजबूत हुई है. उसने नए प्लेटफॉर्म, नए चिप्स और नई तकनीकों पर काम किया है. यह सब आगे काम आ सकता है। 

उदाहरण के तौर पर Meta के स्मार्ट ग्लासेज दुनिया भर में पॉपुलर हो रहे हैं, क्योंकि ये प्रैक्टिकल हैं. अब कंपनी डिस्प्ले वाले स्मार्ट ग्लासेज पर काम कर रही है जो फ्यूचर हो सकता है. हालांकि हाल ही में मेटा ग्लासेज की प्राइवेसी पर बड़े सवाल उठे. दावा किया गया कि मेटा ग्लास से रिकॉर्ड किए प्राइवेट वीडियोज कंपनी के कर्मचारी ट्रेनिंग के लिए देख रहे हैं। 

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