15-मिनट सिटी: भारत में बदलता शहरी जीवन, जहां घर के पास ही मिल रही हर सुविधा

नई दिल्ली
 जरा सोच के देखिए आपको ऑफिस जाना हो और ट्रैफिक की टेंशन न हो। आपके बच्चे का स्कूल थोड़ी ही दूर पैदल रास्ते पर हो, कॉलोनी के गेट पर ही किराने की दुकान हो, सड़क के उस पार जिम हो, नीचे ही फार्मेसी हो और ऑफिस मेट्रो से या 10 मिनट की ड्राइव पर हो। वीकेंड पर मॉल, सिनेमा और रेस्टोरेंट सब पास ही हों।

शहरों में रहने वाले ज्यादातर भारतीयों के लिए यह अब कोई कल्पना नहीं रही। यह जिंदगी जीने का एक नया तरीका बनता जा रहा है। तो '15-मिनट सिटी' की दुनिया में आपका स्वागत है।

15 मिनट सिटी का कॉन्सेप्ट
इसका आइडिया बहुत आसान है। रोजमर्रा की जिंदगी के लिए जरूरी हर चीज काम, पढ़ाई, हेल्थकेयर, शॉपिंग, मनोरंजन और लोगों से मिलना-जुलना आपके घर से 15 मिनट की दूरी पर होनी चाहिए। चाहे आप पैदल जाएं, साइकिल से जाएं या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से थोड़ी दूर का सफर करें।

ऐसे देश में जहां रोजाना आने-जाने में आसानी से दो से तीन घंटे लगते हों वहां घर खरीदने वालों, डेवलपर्स और निवेशकों के बीच इस कॉन्सेप्ट को तेजी से अपनाया जा रहा है। JUSTO RealFintech Ltd. के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर पुष्पमित्र दास कहते हैं, "सच तो यह है कि बात एक ही चीज पर आकर रुकती है जिसे खरीदार अब बर्बाद नहीं कर सकते और वो है समय।"

उन्होंने आगे कहा, रोजाना का सफर चुपचाप शहरी जिंदगी पर लगने वाला सबसे बड़ा टैक्स बन गया है। खरीदार अब सिर्फ यह नहीं पूछते कि फ्लैट कितना बड़ा है, बल्कि यह भी पूछते हैं कि ये पता उन्हें उनकी जिंदगी का कितना हिस्सा वापस देगा? यह बदलाव भारत के रिहायशी परिदृश्य को नया रूप दे रहा है।

बदल रहा रहने का ढंग
कई दशकों तक भारत में घर खरीदने वालों का ध्यान तीन चीजों पर रहा- लोकेशन, कीमत और कब्जा मिलने का समय। पर आज जरूरतों की लिस्ट बहुत लंबी हो गई है। लोग खुली जगहें, टहलने के रास्ते, पास में स्कूल, हेल्थकेयर की सुविधा, सुरक्षा, कम्युनिटी स्पेस, मनोरंजन की सुविधाएं और खरीदारी की आसानी चाहते हैं।

इससे भी जरूरी बात यह है कि वे चाहते हैं कि ये सभी चीजें एक ही इकोसिस्टम में आपस में जुड़ी हों। दास के अनुसार, खरीदार अब सिर्फ चार दीवारों वाला घर नहीं, बल्कि एक खास तरह की जीवनशैली (लाइफस्टाइल) खरीद रहे हैं। हाइब्रिड वर्क ने घर को रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बनाकर इस बदलाव को और तेज कर दिया है।

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यही एक वजह है कि अब बड़े शहरों में नए लॉन्च होने वाले घरों में प्रीमियम और लग्जरी घरों का हिस्सा काफी ज्यादा है। खरीदार ऐसे माहौल के लिए अपना बजट बढ़ाने को तैयार हैं जो उनके जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए।

इंटीग्रेटेड टाउनशिप बना पसंदीदा विकल्प
शहरों में रहने वाले कई अमीर परिवारों के लिए 'इंटीग्रेटेड टाउनशिप' एक पसंदीदा विकल्प बनकर उभर रही हैं, क्योंकि इनमें एक ही मास्टर-प्लान वाले डेवलपमेंट में सुविधा, सुरक्षा, हरियाली और सामाजिक बुनियादी ढांचे जैसी सभी चीजें एक साथ मिलती हैं।

इस सुविधा के लिए कीमत चुकानी पड़ती है और खरीदार इसके लिए पैसे देने को तैयार भी दिखते हैं। दास कहते हैं, "हां और वे खुशी-खुशी ऐसा करने को तैयार हैं, बशर्ते इसकी असल कीमत हो न कि यह सिर्फ ब्रोशर पर दिखाई गई कोई दिखावटी चीज हो।"

इसका लॉजिक सीधा-सादा है। अगर स्कूल, फार्मेसी, कैफे, किराने की दुकानें और फिटनेस सेंटर पैदल दूरी पर हों तो वहां रहने वाले लोग हर हफ्ते अनगिनत घंटे बचा सकते हैं। बचाए गए उस समय का आर्थिक मूल्य है।

आरएमआर ग्रुप की डेवलपमेंट मैनेजर शगुन कालरा के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स में रहने वाले लोग सिर्फ घर के लिए पैसे नहीं दे रहे हैं। वे उस समय के लिए पैसे दे रहे हैं जो वे हर दिन बचाते हैं। वह समय जो किराने का सामान लाने, बच्चों को स्कूल छोड़ने-लाने या मेडिकल जरूरतों के लिए आने-जाने में बर्बाद हो जाता।

ऐसी जगहों पर कितनी हो सकती है फ्लैट की कीमत?
मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, चेन्नई और पुणे जैसे बड़े शहरों में एक अच्छी तरह से प्लान की गई इंटीग्रेटेड टाउनशिप में आम तौर पर 2-बीएचके अपार्टमेंट की कीमत 1.5 करोड़ रुपये से 3.5 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है।

पेंटहाउस की कीमत आम तौर पर लगभग 3.5 करोड़ रुपये से शुरू होती है और प्रीमियम डेवलपमेंट में यह आसानी से 5 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है। ऐसे डेवलपमेंट में एक ही इकोसिस्टम के अंदर रेजिडेंशियल, ऑफिस, रिटेल, वेलनेस और हॉस्पिटैलिटी जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं।

जैसे-जैसे शहरी जमीन कम होती जा रही है और भीड़-भाड़ बढ़ रही है, कालरा का मानना है कि समय के साथ यह प्रीमियम और मजबूत हो सकता है। शहरों की योजना बनाने वाले अक्सर समय की कमी की बात करते हैं। शहर में रहने वाला आम व्यक्ति घर, काम की जगह, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाओं और शॉपिंग की जगहों के बीच आने-जाने में घंटों बिताता है।

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किन सिद्धातों पर आधारित है ये कॉन्सेप्ट

  • '15-मिनट सिटी' का कॉन्सेप्ट ठीक इसी समस्या को हल करने की कोशिश करता है। कालरा के अनुसार, सफल प्रोजेक्ट्स तीन अहम डिजाइन सिद्धांतों पर आधारित होते हैं।
  • पहला है मिक्स्ड-यूज प्लानिंग। इसमें घर, ऑफिस, स्कूल, क्लिनिक और दुकानें अलग-अलग जोन में बंटे होने के बजाय एक ही इलाके में साथ-साथ होते हैं।
  • दूसरी बात है रोजमर्रा की सुविधाओं की सोच-समझकर की गई प्लानिंग। ग्रॉसरी स्टोर, फार्मेसी, डायग्नोस्टिक सेंटर, क्रेच और प्राइमरी स्कूल जान-बूझकर टाउनशिप के मास्टर प्लान में शामिल किए गए हैं।
  • तीसरी बात है ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेशन। कालरा कहते हैं, "कोई भी टाउनशिप उन सभी सुविधाओं की नकल नहीं कर सकती जो एक शहर देता है।"
  • इसका मकसद यह पक्का करना है कि रोजमर्रा की जरूरतें पैदल दूरी पर हों, जबकि कभी-कभार होने वाली जरूरतें जैसे स्पेशलिस्ट अस्पताल, यूनिवर्सिटी या मुख्य बिजनेस इलाके मेट्रो सिस्टम या दूसरे मास ट्रांजिट नेटवर्क के जरिए आसानी से पहुंच में हों। ये सभी चीजें मिलकर लंबी दूरी की यात्रा की जरूरत को काफी हद तक कम कर देती हैं।

कंपनियों को भी यह आइडिया क्यों पसंद है?
'15-मिनट सिटी' का कॉन्सेप्ट सिर्फ रिहायशी रियल एस्टेट को ही नहीं बदल रहा है, बल्कि यह कंपनियों के वर्कप्लेस के बारे में सोचने के नजरिए को भी बदल रहा है। ऑनवर्ड वर्कस्पेस के को-फाउंडर और सीईओ सुव्रत जैन के अनुसार, आज कंपनियां लोकेशन का मूल्यांकन कुछ साल पहले की तुलना में बहुत अलग तरह से करती हैं।

क्लाइंट्स अब सिर्फ किराए या जगह के साइज पर ध्यान नहीं देते। जैन कहते हैं, "वे पूछते हैं कि उनके लोग वहां कैसे पहुंचेंगे, बिल्डिंग के आस-पास क्या है और क्या यह जगह उस तरह के टैलेंट के लिए सही है जिसे वे लाना और बनाए रखना चाहते हैं।"

यह बदलाव कंपनियों को सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट में स्थित एक ही हेडक्वार्टर वाले पारंपरिक मॉडल से दूर जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसके बजाय, कई कंपनियां अब ऐसे डिस्ट्रिब्यूटेड ऑफिस नेटवर्क को प्राथमिकता दे रही हैं जो उन्हीं इलाकों में हों जहां कर्मचारी पहले से रहते हैं। इसका मकसद सीधा है- आने-जाने का तनाव कम करना और ऑफिस तक पहुंचना आसान बनाना।

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उनका कहना है कि जो कंपनियां कर्मचारियों के रहने की जगहों के पास से काम करती हैं, वहां अक्सर ज्यादा अटेंडेंस, बेहतर जुड़ाव और कम एट्रिशन (कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर) देखने को मिलता है।

किन शहरों में हो रहा बूम
    फिलहाल सबसे ज्यादा गतिविधियां भारत के सबसे बड़े मेट्रोपॉलिटन इलाकों में केंद्रित हैं। बेंगलुरु में हॉटस्पॉट में व्हाइटफील्ड, सरजापुर रोड और एयरपोर्ट कॉरिडोर शामिल हैं।
    पुणे के खराडी, हिंजवडी, बानेर और वाकड मार्केट में भी ऐसे ही ट्रेंड देखने को मिल रहे हैं। हैदराबाद में डेवलपर्स गाचीबोवली, कोकापेट और फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट पर बड़ा दांव लगा रहे हैं।
    मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में ठाणे, नवी मुंबई और पनवेल में गतिविधियां बढ़ रही हैं, जिसे बेहतर होते इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क का समर्थन मिल रहा है।
    दिल्ली-एनसीआर एक और बड़े केंद्र के तौर पर उभरा है, जहां द्वारका एक्सप्रेसवे, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड और आने वाले जेवर कॉरिडोर के किनारे कई प्रोजेक्ट्स आकार ले रहे हैं।

कालरा के अनुसार, भारत में पहले से ही कई दर्जन ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो '15-मिनट सिटी' की परिभाषा पर खरे उतरते हैं और मेट्रो सिस्टम के विस्तार के साथ ऐसे और भी प्रोजेक्ट सामने आने की संभावना है।

यह कॉन्सेप्ट अब बड़े मेट्रो शहरों से आगे भी फैल रहा है। लखनऊ, चंडीगढ़, देहरादून, कोयंबटूर, अहमदाबाद और कोच्चि जैसे शहर इस मॉडल की खूबियों को अपना रहे हैं, क्योंकि बढ़ती इनकम और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से खरीदारों की उम्मीदें बदल रही हैं।
क्या चुनौतियां हैं?

इन सब के बीच एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि इस मॉडल में चुनौतियां भी हैं। जमीन के बड़े और जुड़े हुए टुकड़ों को इकट्ठा करना अभी भी मुश्किल है। जमीन का मालिकाना हक अक्सर बिखरा हुआ होता है। मंजूरी की प्रक्रियाएं लंबी हो सकती हैं। बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की जरूरत होती है। सबसे जरूरी बात किफायती होना एक और बड़ी बाधा बनी हुई है।

हालांकि प्रीमियम खरीदार इंटीग्रेटेड कम्युनिटीज को अपना रहे हैं, लेकिन इस मॉडल को अलग-अलग इनकम ग्रुप्स तक फैलाने के लिए डेवलपर्स, अर्बन प्लानर्स और सरकारों के बीच सावधानी से प्लानिंग और सहयोग की जरूरत होगी।

 

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