वक्फ कानून में संशोधनों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बोले सॉलिसिटर जनरल, ‘सरकार जांच क्यों नहीं कर सकती’

नई दिल्ली
वक्फ कानून में संसद द्वारा किए गए हालिया संशोधनों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता बुधवार को सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि ट्रस्ट की जमीन को सरकार सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित करना चाहती है। तुषार मेहता ने कहा, वक्फ कानून 2013 के संशोधन से पहले अधिनियम के सभी संस्करणों में कहा गया था कि केवल मुसलमान ही अपनी संपत्ति वक्फ कर सकते हैं। लेकिन 2013 के आम चुनाव से ठीक पहले एक संशोधन किया गया था, जिसके मुताबिक कोई भी अपनी संपत्ति वक्फ कर सकता है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "वक्फ का अर्थ है कि उपयोग के अनुसार संपत्ति किसी और की है। आपने निरंतर उपयोग करके अधिकार अर्जित किया है। इसलिए जरूरी है कि निजी/सरकारी संपत्ति का उपयोग लंबे समय तक किया जाए। अगर कोई इमारत है जो सरकारी संपत्ति हो सकती है, तो क्या सरकार यह जांच नहीं कर सकती कि संपत्ति सरकार की है या नहीं? इसका प्रावधान 3(सी) में है। ट्रस्ट की जमीन सरकार सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित करना चाहती है।

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भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने कहा, "वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि वक्फ प्रॉपर्टी के विवाद की स्थिति में सरकार अपना ही मामला खुद ही सुनवाई कर तय करेगी।" इस पर तुषार मेहता ने कहा, "राजस्व अधिकारी तय करते हैं कि यह सरकारी भूमि है या नहीं, लेकिन यह केवल राजस्व रिकॉर्ड के उद्देश्य से है। वह विवाद तय नहीं कर सकते। उनका निर्णय अंतिम नहीं है। उनकी जांच पर कलेक्टर निर्णय लेंगे, जबकि यहां उठाई गई आपत्ति यह है कि कलेक्टर अपने मामले में न्यायाधीश होंगे। इसलिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) ने सुझाव दिया कि कलेक्टर के अलावा किसी और को इसमें नामित अधिकारी बनाया जाए।"

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, "उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ का मतलब अनिवार्य रूप से यह है कि आप किसी और की संपत्ति का भी उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को यह क्यों नहीं जांचना चाहिए कि संपत्ति सरकार की है या नहीं। परामर्श के दौरान आपत्ति उठाई गई थी कि कलेक्टर को यह निर्धारित करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए कि भूमि सरकारी भूमि है या नहीं, इसके लिए हमने नामित अधिकारी को बदल दिया।"

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उन्होंने अदालत में दावा किया कि वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में झूठी और काल्पनिक कहानी गढ़ी जा रही है कि उन्हें दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे या वक्फ पर सामूहिक कब्जा कर लिया जाएगा। वक्फ कोई मौलिक अधिकार नहीं है और इसे कानून द्वारा मान्यता दी गई है। एक फैसले के मुताबिक, अगर कोई अधिकार कानून के तहत प्रदान किया जाता है, तो उसे कानून के तहत लिया भी जा सकता है।

उन्होंने कहा कि वक्फ एक इस्लामी अवधारणा है, लेकिन यह इस्लाम का एक अनिवार्य अंग नहीं है। दान हर धर्म का हिस्सा है और यह ईसाई के लिए भी हो सकता है। हिंदुओं में दान की एक प्रणाली है। सिखों में भी यह मौजूद है। इस्लाम में वक्फ कुछ और नहीं बल्कि दान है। वक्फ बोर्ड केवल धर्मनिरपेक्ष कार्य करता है – वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करना, हिसाब-किताब सही रखना, खातों का ऑडिट रखना आदि।

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सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वक्फ बोर्ड में अधिकतम दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति से कोई बदलाव नहीं आएगा। ये लोग किसी भी धार्मिक गतिविधि को प्रभावित नहीं करते। हिंदू बंदोबस्ती आयुक्त मंदिर के अंदर जा सकते हैं, मंदिरों में पुजारी का निर्णय भी राज्य सरकार कर रही है, यहां वक्फ बोर्ड धार्मिक गतिविधि में बिल्कुल दखल नहीं देता है। धर्म में धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं को नियंत्रित करने की शक्ति होती है। संपत्ति का प्रशासन कानून के अनुसार ही होना चाहिए।

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