वाराणसी एयरपोर्ट पर लाइसेंसी पिस्तौल से चली गोली, दो सुरक्षा कर्मी घायल; अब उठे बड़े सवाल

 नई दिल्ली
कमर्शियल उड़ानों में हथियार ले जाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हाल ही में वाराणसी के लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रविवार को अनिवार्य सुरक्षा जांच के दौरान एक यात्री की लाइसेंसी पिस्तौल से अचानक गोली चल गई। गोली के टकराकर रिकॉशेट की वजह से छर्रे लगने से दो सुरक्षा जांचकर्मी घायल हो गए।

यह घटना आजमगढ़ के निवासी कमलेश केदारनाथ राय के साथ हुई, जो एयर इंडिया एक्सप्रेस की उड़ान संख्या IX 1810 से मुंबई जाने वाले थे। नियमों के तहत उन्होंने चेक-इन काउंटर पर अपनी 7.62 एमएम की पिस्तौल और 21 जिंदा कारतूस घोषित किए थे।

इसके बाद उन्हें आइसोलेटेड सुरक्षा बे में ले जाया गया, जहां विमान के कार्गो होल्ड में लोड करने से पहले हथियारों का निरीक्षण किया जाता है। इसी दौरान यह हादसा हुआ, जिसके बाद नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो ने इस मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी है।

वाराणसी हादसे के बाद खड़े होते बुनियादी सवाल
वाराणसी हादसे पर BCAS की जांच उन सवालों पर केंद्रित होगी जिनके जवाब नागरिक उड्डयन मंत्रालय के बयान में स्पष्ट नहीं हैं। सबसे पहला और अहम सवाल यह है कि यात्री ने जांच अधिकारी को जो पिस्तौल सौंपी थी, क्या उसके चैंबर में पहले से गोली थी या उसमें भरी हुई मैगजीन लगी हुई थी। भारत में भी नियमों के अनुसार, यह अपेक्षा की जाती है कि यात्री अपना हथियार पूरी तरह खाली करके ही जांच के लिए सौंपे।

दूसरा सवाल इसके उलट स्थिति का है। यदि यात्री ने खाली हथियार ही सौंपा था, तो क्या यह हादसा सुरक्षा जांचकर्ता के निरीक्षण के दौरान मैगजीन वापस लगाने या चैंबर बंद करने की वजह से हुआ। अगर ऐसा है, तो यह सीधे तौर पर AAICLAS और BCAS के प्रशिक्षण और प्रोटोकॉल की बड़ी खामी को उजागर करता है।

चूंकि वर्तमान सुरक्षा आदेश सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए जांच में यह भी तय किया जाएगा कि प्रक्रिया के किस चरण में हथियार को हाथ लगाने का अधिकार किस अधिकारी के पास था।

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तीसरा और सबसे व्यापक सवाल इस पूरी व्यवस्था की व्यावहारिकता पर है। यह विचारणीय है कि चेक-इन काउंटर पर यात्री द्वारा दिया गया घोषणा का कागज क्या एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा है जो वास्तव में धरातल पर काम करता है, या यह सिर्फ कागजों पर ही मुकम्मल नजर आता है।

क्या है भारत में हथियार ले जाने के नियम?
विमान में लाइसेंसी हथियार ले जाने के नियमों और इनकी शुरुआत की कहानी ब्रिटिश शासन के आखिरी दशक से जुड़ती है। विमान नियमावली का नियम 8 स्पष्ट करता है कि केंद्र सरकार की लिखित अनुमति और तय शर्तों के बिना कोई भी व्यक्ति भारत के भीतर, भारत से बाहर या भारत के ऊपर से उड़ने वाले किसी भी विमान में हथियार या गोला-बारूद नहीं ले जा सकता।

इसी नियम के तहत पायलट, कंसाइनर और सामान संभालने वाले हर व्यक्ति पर सुरक्षा और सावधानी की जिम्मेदारी भी तय की गई है।

वर्तमान समय में यात्री द्वारा हथियार ले जाने की प्रक्रिया BCAS AVSEC आदेश 11/2024 के तहत तय होती है। इसके साथ ही वीवीआईपी और वीआईपी के सुरक्षा अधिकारियों (PSO) के लिए आदेश 03/2022 लागू होता है।

इन उड्डयन नियमों के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम 1959 और शस्त्र नियम 2016 भी काम करते हैं, जो लाइसेंस और कारतूसों की सीमा निर्धारित करते हैं। वहीं, नियमों के उल्लंघन पर विमान अधिनियम 1934 के तहत दंड का प्रावधान किया गया है।

क्या है हथियार ले जाने की प्रक्रिया?
भारतीय कानून के तहत कमर्शियल फ्लाइट में लाइसेंसी हथियार ले जाने के लिए सरकार हर मामले के आधार पर प्रक्रियात्मक शर्तों के साथ अनुमति देती है।

इस प्रक्रिया के तहत यात्री को एयरलाइन को अग्रिम सूचना देनी होती है और चेक-इन के समय मूल शस्त्र लाइसेंस के साथ हथियार व कारतूस की घोषणा करनी होती है। एयरलाइन यात्री की पहचान और लाइसेंस का सत्यापन करने के बाद उसे एक सुरक्षा जांचकर्ता के पास भेजती है।

जांचकर्ता यात्री को सामान्य सुरक्षा जांच बेल्ट से अलग स्पेशल आइसोलेटेड बे में ले जाता है। वहां हथियार का चैंबर खोलकर और मैगजीन बाहर निकालकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसमें कोई गोली न हो।

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इसके बाद खाली हथियार को एक मजबूत, ताला लगे हार्ड-साइडेड बॉक्स में रखा जाता है। कारतूसों को निर्माता के मूल डिब्बे या स्वीकृत मेटल अथवा फाइबर बॉक्स में अलग पैक करना अनिवार्य है।

एयरलाइंस आमतौर पर लाइसेंस के आधार पर 5 किलोग्राम तक वजन या अधिकतम 50 कारतूस की अनुमति देती हैं। इसके बाद हथियार और कारतूस विमान के उस कार्गो होल्ड में रखे जाते हैं जहां उड़ान के दौरान किसी की पहुंच न हो। गंतव्य पर यात्री रसीद और फोटो पहचान पत्र दिखाकर ही इन्हें वापस ले सकता है।

वाराणसी सहित अधिकांश हवाई अड्डों पर यह जांच एएआई की कार्गो-लॉजिस्टिक्स इकाई AAICLAS के प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा की जाती है। उनके आसपास सीआईएसएफ के सशस्त्र जवान तैनात रहते हैं, जो सुरक्षा व्यवस्था संभालते हैं लेकिन हथियार को खुद हाथ नहीं लगाते। BCAS इन सभी मानकों को तय करने और अनुपालन का ऑडिट करने का काम करता है।

अमेरिका में हवाई यात्रा के कड़े नियम
भारत और अमेरिका की जमीनी गन-कल्चर में भारी अंतर होने के बावजूद आसमान में दोनों देशों के सुरक्षा नियम लगभग एक समान हैं। अमेरिकी फेडरल रेगुलेशन कोड (49 CFR) के तहत, किसी भी राज्य के खुलेआम या छिपाकर हथियार ले जाने वाले कानून के बावजूद, यात्री के पास या विमान के केबिन में हथियार ले जाना पूरी तरह अवैध है।

इसे केवल चेक्ड बैगेज में ही ले जाया जा सकता है, वह भी तब जब यात्री चेक-इन से पहले इसकी घोषणा करे। हथियार अनलोडेड होना चाहिए और एक हार्ड-साइडेड बॉक्स में बंद होना चाहिए जिसकी चाबी केवल यात्री के पास हो।

नियमों की इस सख्ती के बावजूद अमेरिका में इनका अक्सर उल्लंघन होता है। वर्ष 2024 में यूएस ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने अमेरिकी हवाई अड्डों पर सुरक्षा जांच चौकियों से 6,678 हथियार जब्त किए, जिनमें से लगभग 94 प्रतिशत हथियार लोडेड थे।

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अमेरिकी अदालतों ने स्पष्ट किया है कि संविधान के दूसरे संशोधन के तहत मिला हथियार रखने का अधिकार एयरपोर्ट की सुरक्षा जांच रेखा पर समाप्त हो जाता है। नियमों का उल्लंघन करने वाले यात्रियों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है और उन्हें 10 साल तक की जेल भी हो सकती है।

क्या है सख्त नियमों की ऐतिहासिक कहानी?
भारत में नागरिक उड्डयन सुरक्षा की शुरुआत 10 सितंबर 1976 की घटना से होती है, जब छह लोगों ने दिल्ली से मुंबई जा रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर उसे लाहौर डायवर्ट कर दिया था।

इस घटना के बाद पांडे समिति का गठन हुआ और जनवरी 1978 में नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) की स्थापना की गई। यह देश की पहली गंभीर विमानन-सुरक्षा नौकरशाही थी जिसका काम सुरक्षा कर्मियों को प्रशिक्षित करना और निगरानी करना था।

नौ साल बाद, 23 जून 1985 को एयर इंडिया के कनिष्क विमान (उड़ान 182) में अटलांटिक महासागर के ऊपर एक सूटकेस बम विस्फोट हुआ, जिसमें 329 लोग मारे गए थे। इस भयावह आतंकी हमले के बाद 1 अप्रैल 1987 को BCAS को नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत एक स्वतंत्र विभाग बना दिया गया।

आज भारतीय हवाई अड्डों पर होल्ड-बैगेज स्क्रीनिंग और हथियारों की जांच के लिए अलग बे जैसी जितनी भी प्रक्रियाएं हैं, वे इसी पुनर्गठन की देन हैं।

सुरक्षा का तीसरा बड़ा बदलाव 1999 के अंत में आया जब आतंकियों ने इंडियन एयरलाइंस की उड़ान IC-814 का काठमांडू से अपहरण कर लिया और उसे कंधार ले गए। इस आठ दिवसीय संकट के जवाब में वर्ष 2000 की शुरुआत में स्काई मार्शल कार्यक्रम शुरू किया गया।

इसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के सशस्त्र और सादे कपड़ों वाले अधिकारियों को संवेदनशील उड़ानों में तैनात किया जाने लगा। अमेरिका में भी 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद निजी सुरक्षा व्यवस्था खत्म कर TSA का गठन किया गया और सशस्त्र पायलटों के लिए फेडरल फ्लाइट डेक ऑफिसर कार्यक्रम लागू किया गया।

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