कैब ड्राइवर से नायब सूबेदार तक, सलमान खान ने रचा इतिहास; रोइंग में जीता भारत का पहला मेडल

नई दिल्ली
जब जापान के नागोया में मेंस डबल स्कल्स रोइंग का फाइनल मुकाबला खत्म हुआ और भारत का तिरंगा आसमान में लहराया, तो 2,000 मीटर के वाटर कोर्स पर खड़े सलमान खान की आंखों से आंसू छलक पड़े। ये आंसू सिर्फ एक मेडल की खुशी के नहीं थे, ये आंसू थे उस दर्द, बेबसी और कड़े संघर्ष के जो उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर कैब चलाते वक्त भोगे थे। सतनाम सिंह के साथ मिलकर 6:13.25 के समय में इतिहास का पहला मेडल जीतने वाले सलमान खान की यह कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म से भी ज्यादा भावुक और प्रेरणादायक है।

18 साल की उम्र में सिर से उठा पिता का साया, सपनों को मार उठानी पड़ी स्टेयरिंग
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के पूरे धींगई गांव में जन्मे सलमान खान का बचपन कभी आसान नहीं रहा। छह भाई-बहनों में सबसे बड़े सलमान के पिता मोहम्मद कासिम खान हरियाणा के ताउरू में ट्रक की बॉडी बनाने का काम करते थे। सलमान का सपना बचपन से ही भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब सलमान महज 18 साल के थे, तब डेंगू के कारण उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। रातों-रात पूरे परिवार के राशन और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी 18 साल के सलमान के नाजुक कंधों पर आ गिरी। फौज में भर्ती होने के अपने सपने को दिल में दफन कर सलमान काम की तलाश में दिल्ली आ गए। परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने दिन-रात दिल्ली की चिलचिलाती धूप और कड़ाके की ठंड में कैब चलाना शुरू कर दिया।

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किस्मत ने बदली करवट, कैब ड्राइवर से नायब सूबेदार तक का सफर
सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाते हुए भी सलमान की आंखों में फौज की वर्दी का सपना मरा नहीं था। एक दोस्त ने उनकी अच्छी लंबाई और फौलादी काठी को देखकर उन्हें दोबारा आर्मी भर्ती में किस्मत आजमाने की सलाह दी। सलमान ने कैब की चाबी दूसरे ड्राइवर को सौंपी और केवल 4 महीने की दिन-रात की जी-तोड़ मेहनत के बाद 25 सितंबर 2018 को बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप, पुणे में भारतीय सेना में शामिल हो गए।

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फौज में आने के बाद कोचों ने उनके लंबे कद को देखकर उन्हें रोइंग में उतरने को कहा। जिस खेल का नाम तक सलमान ने कभी नहीं सुना था, उसमें नाव संभालना उनके लिए बेहद कठिन था। दो बार उनका हौसला इस कदर टूटा कि वे खेल छोड़ना चाहते थे, लेकिन आर्मी के सीनियर कोचों ने उनका हाथ थामे रखा। सलमान की मेहनत रंग लाई और वे नेशनल गेम्स से लेकर एशियन रोइंग कप में गोल्ड मेडल जीतते चले गए। उनके इस ऐतिहासिक प्रदर्शन की बदौलत भारतीय सेना ने उन्हें 'नायब सूबेदार' के पद पर पदोन्नत किया।

अंतिम समय में बदला पार्टनर, फिर भी रचा इतिहास
एशियन गेम्स 2026 से ठीक कुछ दिन पहले भारतीय रोइंग टीम में भारी विवाद और अचानक फेरबदल हुआ। सलमान और उनके साथी सतनाम सिंह को क्वाड्रपल स्कल्स से हटाकर अचानक डबल स्कल्स में डाल दिया गया। तमाम मानसिक तनाव और नई जोड़ी के बावजूद, सतनाम और सलमान ने पानी पर उतरकर ऐसा गदर मचाया कि 1500 मीटर की रेस तक वे गोल्ड मेडल की रेस में दूसरे नंबर पर बने रहे। हालांकि, आखिरी 500 मीटर में वे मामूली अंतर से खिसककर तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन भारत को मेन्स डबल स्कल्स का पहला एशियन गेम्स मेडल दिला दिया।

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जिंदगी की सबसे बड़ी जंग जीत गए सलमान
कभी दिल्ली के ट्रैफ़िक में चंद रुपयों के लिए रात-रात भर जागने वाला यह लड़का आज पूरे हिंदुस्तान का गर्व बन चुका है। सलमान खान का यह ब्रॉन्ज मेडल सिर्फ एक खेल की जीत नहीं है, बल्कि यह उस हर उस इंसान की जीत है जो गरीबी, मजबूरी और दुखों के आगे हार नहीं मानता।

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