चांद का आकार हो रहा छोटा! क्या एक दिन धरती से ओझल हो जाएगा हमारा चंद्रमा?

नई दिल्ली

क्या चंद्रमा का आकार छोटा हो रहा है? क्या यह धीरे-धीरे पूरी तरह से गायब हो जाएगा? हाल ही में प्रकाशित एक स्टडी में इससे जुड़े दावे किए गए हैं। प्लेनेटेरी साइंस जॉर्नल में 14 अक्टूबर को प्रकाशित शोध के मुताबिक चंद्रमा सिकुड़ रहा है। इसके मुताबिक पिछले 400 साल में यह 148 फीट सिकुड़ चुका है। इस स्टडी का नेतृत्व थॉमस आर वाटर्स ने किया। वह स्मिथसोनियन के नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम में सेंटर फॉर अर्थ एंड प्लानेटरी स्टडीज के सीनियर वैज्ञानिक हैं। उन्होंने इसने लूनर रिकॉन्सेंस ऑर्बिटर कैमरा से मिले ऑब्जर्वेशंस का इस्तेमाल किया।

 पिछले करीब 40 करोड़ साल में चांद की त्रिज्या लगभग 45 मीटर कम हुई है. इस खोज से चांद पर इंसानों को उतारने की तैयारी कर रहे नासा के आर्टेमिस मिशन के लिए सुरक्षित जगह चुनना और जरूरी हो गया है। 

वैज्ञानिकों ने चांद की सतह पर लंबी और उभरी हुई संरचनाओं का अध्ययन किया. इन्हें लोबेट स्कार्प और मारे रिज कहा जाता है. ये संरचनाएं चांद के सिकुड़ने के कारण बनती हैं. जब चांद का आकार कम होता है, तो उसकी सतह पर दबाव पड़ता है. इससे फॉल्ट बनते हैं. इन फॉल्ट में हलचल होने पर चांद पर भूकंप आ सकते हैं। 

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चांद पर भूकंप क्यों आते हैं?

चंद्रमा का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है. ठंडा होने से उसका आकार सिकुड़ता है. इससे उसकी सतह पर दबाव पड़ता है. इस दबाव के कारण नए फॉल्ट बन सकते हैं या पहले से मौजूद फॉल्ट में हलचल हो सकती है. इसी हलचल से चांद पर भूकंप आते हैं. इन भूकंपों को मूनक्वेक कहा जाता है। 

साल 2019 में वैज्ञानिक टॉम वॉटर्स और उनकी टीम ने भी चांद की सतह पर मौजूद फॉल्ट और भूकंप के बीच संबंध के सबूत दिए थे. अपोलो मिशन के दौरान चांद पर लगाए गए सीस्मोमीटर ने भूकंप दर्ज किए थे. इन भूकंपों के केंद्र फॉल्ट के काफी पास थे. इससे वैज्ञानिकों को पता चला कि चंद्रमा की सतह पर दिखने वाली ये संरचनाएं भूकंप से जुड़ी हो सकती हैं। 

लाखों फोटो का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने 17 साल की अवधि में ऑर्बिटर कैमरे से लिए गए लाखों चित्रों का विश्लेषण किया। इससे उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि चांद की संरचना कैसे बदलती है क्योंकि यह ठंडा होता जा रहा है। स्टडी से यह निष्कर्ष निकला कि चांद हर मिलियन साल में 6 से 11 सेंटीमीटर सिकुड़ता रहेगा। यह धरती के प्लेटों की औसत गति से कहीं कम है। यह नाखूनों के बढ़ने की दर के बराबर है। वैज्ञानिकों ने इसकी वजह, धरती के अंदरूनी हिस्से से निकलने वाली गर्मी को बताया है।

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क्यों खतरनाक हैं छोटी दरारें
वैसे तो चांद लाखों साल से सिकुड़ रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना था था कि यह नजरों से ओझल नहीं होगा। इस स्टडी ‘थ्रस्ट फॉल्टिंग एंड द लेट-स्टेज कोंट्रैक्शन ऑफ द मून’ में एक और क्षेत्र हाइलाइट किया गया है। यह चाँद की बाहरी परत की सिकुड़न और फटने से छोटे-छोटे ढालों जैसी चोटियों का निर्माण करता है। इन्हें लोबेट स्कॉर्प्स कहा जाता है। इस सिकुड़न के चलते चंद्रमा की सतह पर हजारों छोटी दरारों के साथ मूनक्वेक्स होते हैं। जब नासा भविष्य के मिशन की योजना बनाता है, तो उन्हें इसका ध्यान में रखना पड़ता है। स्टडी के दौरान चंद्रमा की सतह पर 10,000 से अधिक नई दरारों को भी देखा।

कहीं भी आ सकता है भूकंप
स्टडी में कहा गया है कि चंद्रमा के ठंडा होने और सिकुड़ने के चलते इसकी सतह पर कहीं भी फिसलन और दरारें पैदा हो सकती हैं। यह धरती की तरह से बिल्कुल भी नहीं है। असल में धरती पर, करीब 90 फीसदी सभी भूकंपीय गतिविधियां लिथोस्फेरिक प्लेटों की सीमाओं के पास होती हैं। लेकिन चंद्रमा एक सिंगल-प्लेट बॉडी जैसा है, जहां पर दरारें चिंता की बात हैं। इसका मतलब है कि चंद्रमा पर भूकंप कहीं भी आ सकता है।

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कुल मिलाकर चंद्रमा का सिकुड़ना वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है लेकिन इससे उसके जल्द गायब होने का खतरा नहीं है। नई स्टडी चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से में होने वाले बदलावों और उसकी सतह पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में मदद करती है। वैज्ञानिकों के लिए असली चुनौती यह जानना है कि ये बदलाव भविष्य के चंद्र अभियानों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं। इस शोध से स्पष्ट होता है कि चंद्रमा आज भी भूवैज्ञानिक रूप से बदलावों से गुजर रहा है और उसकी सतह को समझना अंतरिक्ष विज्ञान के लिए लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।

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