MP में मछली पालन को मिलेगा बढ़ावा, हलाली-इंदिरासागर डैम बनेंगे फिशरीज मॉडल

भोपाल 

मध्यप्रदेश में मछली पालन को बड़े उद्योग और अंतरराष्ट्रीय निर्यात कारोबार के रूप में विकसित करने की तैयारी है। इसके लिए प्रदेश के चार बड़े जलाशयों में आधुनिक तकनीक से मछली उत्पादन बढ़ाने और उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन व विपणन तक की व्यवस्था विकसित की जाएगी।

इंदौर की कामदार्स केयर और कुवैत की जबेदी अल कुवैत फिशरीज कंपनी के बीच करीब ₹7,430 करोड़ के निवेश और बाय-बैक व्यवस्था से जुड़ा समझौता हुआ है।सरकार का लक्ष्य अगले तीन साल में मछली उत्पादन दोगुना करना और मध्यप्रदेश को देश के प्रमुख मत्स्य निर्यात केंद्रों में शामिल करना है।इसी दिशा में शुक्रवार को भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव-2026 आयोजित होगा।

इसमें मत्स्य निवेश एवं निर्यात मार्गदर्शिका जारी की जाएगी। जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास को आगे बढ़ाने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति भी सौंपी जाएगी। सम्मेलन में देश-विदेश के निवेशकों, निर्यातकों और मत्स्य कारोबार से जुड़े उद्यमियों के शामिल होने की तैयारी है।

चार जलाशयों में ₹7,430 करोड़ का निवेश
मध्यप्रदेश में मत्स्य कारोबार को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए हुए समझौते के तहत इंदिरा सागर, बरगी, बाणसागर और बारना जलाशयों में आधुनिक केज कल्चर और उससे जुड़ी सुविधाएं विकसित करने की योजना है। परियोजना के जरिए करीब चार लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त मछली उत्पादन का लक्ष्य बताया गया है।

ये भी पढ़ें :  मध्य प्रदेश के कई जिलों में बारिश, ओले भी गिरे... कई शहरों में 40 डिग्री तक पहुंच गया है दिन का तापमान

केज कल्चर में जलाशय के भीतर जाल से बने पिंजरों में नियंत्रित तरीके से मछलियां पाली जाती हैं। इससे उपलब्ध जलक्षेत्र का बेहतर उपयोग कर बड़े पैमाने पर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

परियोजना में एक्वापोनिक्स, हाइड्रोपोनिक्स और ग्रीनहाउस के जरिए सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने की योजना भी शामिल है। इससे मत्स्य पालन के साथ कृषि आधारित गतिविधियों और रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है।

हलाली और इंदिरा सागर बनेंगे मॉडल
केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश को रिजर्वायर फिशरीज क्लस्टर कार्यक्रम में शामिल किया है। इसके तहत रायसेन के सम्राट अशोक सागर यानी हलाली जलाशय और खंडवा के इंदिरा सागर जलाशय को मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

यहां मत्स्य बीज और चारे की उपलब्धता से लेकर मछली उत्पादन, निकासी, प्रसंस्करण, शीत भंडारण, परिवहन और मार्केटिंग तक की व्यवस्था विकसित करने पर जोर रहेगा।

हलाली जलाशय में वर्ष 2024-25 में मछली उत्पादकता 361 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष दर्ज की गई थी, जो 2025-26 में 319 किलोग्राम रही। विभागीय जानकारी के अनुसार, मध्यम श्रेणी के जलाशयों में यह सर्वाधिक उत्पादकता है। वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन और बेहतर प्रबंधन के जरिए यहां उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।

ये भी पढ़ें :  सूखी सेवनिया समेत 7 गांवों में टाइगर का आतंक, 15 दिनों में आधा दर्जन मवेशियों का शिकार

एक लाख केज लगाने और उत्पादन दोगुना करने का लक्ष्य
मध्यप्रदेश में मत्स्य पालन के लिए करीब 4.50 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र उपलब्ध है। वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 4.95 लाख मीट्रिक टन से अधिक मछली उत्पादन हुआ, जो अब तक का सर्वाधिक बताया गया है।

मध्यप्रदेश एकीकृत मत्स्योद्योग नीति-2026 के तहत जलाशयों में करीब एक लाख केज स्थापित करने और अगले तीन वर्षों में मछली उत्पादन दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और उत्पादन से बाजार तक की पूरी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

मछली के साथ मोती, मखाना और सब्जियों का उत्पादन
नई नीति में एकीकृत मत्स्य पालन को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके तहत उपयुक्त जलक्षेत्रों में मछली पालन के साथ बतख और कुक्कुट पालन, मोती उत्पादन, कमल, सिंघाड़ा और मखाने की खेती को बढ़ावा देने की योजना है।

एक्वापोनिक्स के माध्यम से मछली पालन के साथ सब्जियां, फूल और औषधीय पौधे उगाने की संभावनाएं भी विकसित की जाएंगी।

ये भी पढ़ें :  ईव्हीएम एफएलसी कार्य का प्रेक्षक ने किया अवलोकन

इस मॉडल से एक ही जल संसाधन के जरिए कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा सकेंगे। इससे मछुआरों और किसानों को आय के अतिरिक्त स्रोत मिल सकते हैं। प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और विपणन से जुड़े कारोबार में ग्रामीण युवाओं और महिला स्व-सहायता समूहों के लिए भी अवसर बनने की संभावना है।

₹40 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव, 3.5 लाख रोजगार का अनुमान
प्रदेश की एकीकृत मत्स्योद्योग नीति के तहत अब तक करीब ₹40 हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने की जानकारी दी गई है। इनके क्रियान्वयन से मत्स्य बीज, चारा, प्रसंस्करण, शीत भंडारण, परिवहन, विपणन और निर्यात से जुड़ी पूरी मूल्य शृंखला विकसित करने की योजना है।

इन प्रस्तावों के जरिए करीब 3.5 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार व स्वरोजगार के अवसर बनने का अनुमान है।
इसके लिए जलाशयों के आसपास शासकीय भूमि उपलब्ध कराने, मछली उतारने के केंद्र, रोग निदान प्रयोगशालाएं और प्रसंस्करण इकाइयां विकसित करने की व्यवस्था भी की जा रही है। उद्देश्य मछली की गुणवत्ता बनाए रखते हुए उसे दूरस्थ बाजारों तक पहुंचाना और उत्पादन बढ़ने पर मछुआरों को बेहतर दाम दिलाना है।

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment