रबी सीजन के लिए तिलहन के रकबे में गिरावट, तिलहन के बजाय गेहूं को प्राथमिकता दे रहे हैं किसान

नई दिल्ली
देश में आने वाले दिनों में खाने के तेल की किल्लत हो सकती है। इसकी वजह यह है कि किसान तिलहन से ज्यादा गेहूं की फसल पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। रबी फसलों का कुल रकबा 2024-25 में पिछले फसल वर्ष की तुलना में बढ़ा है लेकिन इस दौरान तिलहन फसलों के रकबे में गिरावट आई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 55 फीसदी खाद्य तेल आयात करता है। सरकार इंपोर्ट बिल कम करने के लिए देश में तिलहन के रकबे को बढ़ाने में लगी है। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद चालू वर्ष में 2023-24 की तुलना में गेहूं के रकबे में लगभग 2.8% की बढ़ोतरी हुई है जबकि तिलहनी फसलों का रकबा 4% गिरा है।

ये भी पढ़ें :  डेरा ब्यास प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों नायब सैनी के CM बनने के बाद आवास पर पहुंचे , मुख्यमंत्री बोले- आशीर्वाद बना रहे

कुल मिलाकर इस साल सभी फसलों का रकबा पिछले वर्ष के 644 लाख हेक्टेयर की तुलना में लगभग 656 लाख हेक्टेयर है। इसमें करीब 12 लाख हेक्टेयर यानी 2% की बढ़ोतरी हुई है। इसमें रबी की मुख्य फसल गेहूं का रकबा आधा यानी 324 लाख हेक्टेयर है। साल 2023-24 में यह 315 लाख हेक्टेयर था। कृषि मंत्रालय द्वारा रबी बुआई सीजन के अंत में जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक दलहनों का रकबा 3 लाख हेक्टेयर बढ़ा है। साल 2023-24 में यह 139 लाख हेक्टेयर था जो 2024-25 में बढ़कर 142 लाख हेक्टेयर हो गया।

ये भी पढ़ें :  होर्मुज नहीं, इस बार बाब अल-मंदेब रूट से भारत पहुंचा क्रूड ऑयल से भरा टैंकर

गेहूं की तरफ झुकाव क्यों

दूसरी ओर तिलहन के रकबे में चार लाख हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई है। 2023-24 में यह 102 लाख हेक्टेयर था जो 2024-25 में घटकर 98 लाख हेक्टेयर रह गया है। रेपसीड और सरसों के रकबे में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य सुधीर पंवार ने कहा कि गेहूं और दलहन जैसी प्रतिस्पर्धी फसलों की तुलना में तिलहन पर किसानों को कम रिटर्न मिलता है। यही वजह है कि किसान इससे दूरी बना रहे हैं। गेहूं के लिए मूल्य संकेत पॉजिटिव है जबकि तिलहन के लिए यह स्थिर या निगेटिव है।

ये भी पढ़ें :  दिल्ली के 5633 स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के लिए बाल संरक्षण समिति का होगा गठन

पंवार ने बताया कि सरकार के बाजार में हस्तक्षेप नहीं करने के कारण किसानों को सरसों, सूरजमुखी और सोयाबीन को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। चूंकि तिलहन की स्टोरेज लाइफ गेहूं की तुलना में कम है, इसलिए किसानों के पास कम कीमत पर बिक्री के अलावा कोई चारा नहीं था। आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल बाजरे का रकबा भी लगभग 56 लाख हेक्टेयर पर स्थिर रहा जबकि सरकार लगातार किसानों से फसल को डाइवर्सिफाई करने की अपील कर रही है।

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment