होलिका को मिला था ब्रह्मा जी से वरदान, फिर भी वो क्यों जल गई और कैसे बचे प्रहलाद?

हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है. इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इस साल होलिका दहन 03 मार्च को मनाया जाएगा. उसके अगले दिन यानी 04 मार्च को रंगों के साथ होली खेली जाएगी. होली के आते ही होलिका दहन की कहानी सुनाई जाती है.

इसमें बताया जाता है कि किस तरह से होलिका जली थी और भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद बच गए थे, लेकिन आखिर प्रहलाद कैसे बच गए थे और होलिका वरदान के बाद भी क्यों जल गई थी? चलिए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

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पौराणिक कथा के अनुसार…

पौराणिक कथा के अनुसार, होलिका ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की थी. होलिका की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे एक चादर प्रदान की थी. ये चादर हमेशा उसे आग से सुरक्षित रखती थी. यही ब्रह्मा जी का वरदान था. उन्होंने होलिका से कहा था कि जब वो ये चादर ओढ़ेगी तो उसके ऊपर आग का प्रभाव नहीं होगा. होलिका का भाई हिरण्यकश्यप बहन को मिले इस वरदान के बारे जानता था.

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जब हिरण्यकश्यप के प्रहलाद को मारने के सारे प्रयास विफल हो गए तो उसने होलिका से अपने बेटे प्रहलाद को लेकर होली की अग्नि में बैठने के लिए कहा था. होलिका ने अपने भाई के कहे अनुसार ही काम किया वो प्रहलाद को लेकर होली की अग्नि में बैठी, लेकिन इस दौरान होलिका स्वयं जल गई और प्रहलाद बच गए. जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि पर बैठी तो वो उस दौरान भगवान विष्णु का नाम जपने लगे.

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इस वजह से अग्नि में जल गई होलिका

भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद बच गए और होलिका अग्नि में जल गई. होलिका इसलिए जली क्योंकि उसी मंशा छल, पाप व निर्दोष को नुकसान पहुंचाने की थी. होलिका जिस दिन आग में जली वो फाल्गुन मास की पूर्णिमा का दिन था. तभी से इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में होलिका दहन मनाया जाने लगा.

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