आषाढ़ अमावस्या का महत्व, व्रत कथा से जुड़ी सुख-समृद्धि की मान्यता

आषाढ़ महीने में पड़ने वाली अमावस्या को खास महत्व दिया जाता है. इसे हलहारिणी अमावस्या या आषाढ़ी अमावस्या के नाम से जाना जाता है. इस दिन लोग सुबह-सुबह पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और अपने पितरों को याद कर उनका तर्पण करते हैं.

मान्यता है कि इस दिन दान-पुण्य करने से पुण्य फल मिलता है, इसलिए लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार जरूरतमंदों की मदद भी करते हैं. खास बात यह है कि किसान वर्ग के लिए भी यह दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है. वे अपने हल और खेती-बाड़ी में इस्तेमाल होने वाले औजारों की पूजा करते हैं, ताकि आने वाला समय अच्छी फसल लेकर आए. ज्योतिषियों की मानें तो, आषाढ़ अमावस्या पर कथा सुनना बहुत ही शुभ माना जाता है. आइए जानते हैं.

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आषाढ़ अमावस्या की कथा
बहुत समय पहले एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे. दोनों भगवान विष्णु के सच्चे भक्त थे और दिन का अधिकतर समय पूजा-पाठ में बिताते थे. उनके घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण वे अंदर से दुखी रहते थे. एक दिन ब्राह्मण ने तय किया कि वह वन में जाकर कठोर तप करेगा. वह अपनी पत्नी को समझाकर भगवान पर भरोसा रखते हुए जंगल चला गया. कई साल बीत गए, लेकिन उसकी तपस्या का कोई फल नहीं मिला. निराश होकर उसने अपना जीवन समाप्त करने का विचार बना लिया और पेड़ पर फंदा लगाकर जान देने की कोशिश करने लगा.

उसी समय वहां सुख अमावस्या देवी प्रकट हुईं. उन्होंने ब्राह्मण को रोका और कहा कि उसके भाग्य में संतान नहीं है, लेकिन वे उसे दो बेटियों का आशीर्वाद देती हैं. देवी ने यह भी कहा कि एक बेटी का नाम अमावस्या और दूसरी का नाम पूनम रखना. साथ ही उन्होंने ब्राह्मण को अपनी पत्नी से एक वर्ष तक सुख अमावस्या का व्रत रखने और हर अमावस्या को चावल का दान करने के लिए कहा. ब्राह्मण घर लौटा और उसने सारी बात अपनी पत्नी को बताई. उसकी पत्नी ने पूरी श्रद्धा से व्रत शुरू किया. कुछ समय बाद उनके घर दो बेटियों ने जन्म लिया, जिनका नाम अमावस्या और पूनम रखा गया.

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समय के साथ दोनों बेटियां बड़ी हुईं और उनका विवाह हो गया. बड़ी बेटी अमावस्या बहुत धार्मिक थी और हमेशा पूजा-पाठ में लगी रहती थी. उसके घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती थी. वहीं छोटी बेटी पूनम भगवान में विश्वास नहीं करती थी, जिसके कारण उसके घर में तंगी और परेशानियां थीं. जब अमावस्या को अपनी बहन की हालत का पता चला, तो वह उससे मिलने गई. उसने पूनम को समझाया कि वह भी एक साल तक सुख अमावस्या का व्रत करे और हर अमावस्या को चावल का दान दे. पूनम ने बहन की बात मान ली और पूरे नियम से व्रत करना शुरू कर दिया.

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कुछ ही समय में उसका जीवन बदलने लगा. एक साल के भीतर उसके घर में सुख-समृद्धि लौट आई और उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई. इस तरह सुख अमावस्या के व्रत का महत्व सिद्ध हुआ.

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