भोपाल उज्जैन के इंगोरिया विकासखंड की एक छोटी सी आंगनवाड़ी में रोज़ की तरह खिलखिलाते बच्चों का शोर था, लेकिन यहाँ बच्चों को केवल पोषाहार या प्राथमिक अक्षर-ज्ञान ही नहीं मिल रहा था, बल्कि उनके नन्हे हाथों में एक नया आत्मविश्वास बुना जा रहा था। इस बदलाव की सूत्रधार थीं दिव्या नागर—एक ऐसी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जिनके भीतर एक मुक्केबाज़ (बॉक्सर) का जज़्बा और एक माँ जैसी ममता दोनों एक साथ धड़कते हैं। दिव्या जानती थीं कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन बच्चों में असीम क्षमताएं छिपी हैं, बस ज़रूरत है तो…
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