बारां के लहसुन को जीआई टैग की सौगात, किसानों को मिलेगा अंतरराष्ट्रीय बाजार में नया मुकाम

बारां
राजस्थान के कृषि मानचित्र पर अपनी खास पहचान रखने वाला बारां जिले का लहसुन अब जल्द ही वैश्विक स्तर पर पहचान हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। जिले के लहसुन को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग दिलाने के लिए कृषि उपज मंडी समिति बारां ने औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके तहत लहसुन की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री के लिए प्रस्ताव तैयार कर बौद्धिक संपदा कार्यालय, चेन्नई भेजा गया है। अधिकारियों को उम्मीद है कि यह प्रस्ताव शीघ्र स्वीकृत होगा और बारां के लहसुन को जीआई टैग मिल जाएगा।

कृषि उपज मंडी समिति ने करीब एक माह पूर्व इस दिशा में पहल की थी। प्रस्ताव कृषि महाविद्यालय बारां, कृषि विश्वविद्यालय कोटा और राजस्थान राज्य कृषि विपणन बोर्ड जयपुर के सहयोग से तैयार किया गया है। इसे ‘आवेदक समूह उत्पादकों’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है, जो कृषि उत्पाद बाजार समिति बारां के नाम से पंजीकृत होगा। जीआई टैग मिलने से जिले के लहसुन को कानूनी संरक्षण मिलेगा और उसकी विशिष्ट पहचान सुरक्षित रहेगी।

ये भी पढ़ें :  हनुमानगढ़ में केंद्रीय सहकारी बैंक मुख्य प्रबंधक को साढ़े आठ लाख की संदिग्ध राशि के साथ पकड़ा

लहसुन उत्पादन में प्रदेश में अग्रणी बारां
दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में स्थित बारां जिला लहसुन उत्पादन के मामले में प्रदेश में अग्रणी है। औषधीय श्रेणी की इस फसल में बारां क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता—तीनों ही दृष्टियों से राजस्थान में प्रथम स्थान रखता है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य में औसतन 89,805 हेक्टेयर क्षेत्र में लहसुन की बुवाई होती है, जिसकी औसत उत्पादकता 5,916 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। वहीं बारां जिले में औसतन 30,714 हेक्टेयर क्षेत्र में लहसुन की खेती होती है और उत्पादकता 6,133 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचती है। पिछले तीन-चार वर्षों से जिले में औसतन 16 लाख क्विंटल लहसुन मंडियों में पहुंच रहा है।

ये भी पढ़ें :  राजस्थान-जयपुर में मकर संक्रांति पर पतंग उत्सव, मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने गुब्बारे उड़ाकर किया उद्घाटन

क्यों खास है बारां का लहसुन
बारां के लहसुन की अलग पहचान का सबसे बड़ा कारण यहां की काली मिट्टी है, जिसमें पोटाश तत्व की मात्रा अधिक पाई जाती है। पोटाश लहसुन की गुणवत्ता, स्वाद और सुगंध को बेहतर बनाता है। लहसुन की कली में पाए जाने वाले ‘डाई एमिल डाई सल्फाइड’ नामक ऑर्गेनो सल्फर यौगिक के कारण इसकी तेज गंध और औषधीय गुण लंबे समय तक बने रहते हैं। कम तापमान और अनुकूल जलवायु भी इसकी गुणवत्ता को और बढ़ाती है।

ये भी पढ़ें :  राजस्थान-सिरोही के माउंट आबू में पारा गिरकर 12 डिग्री पहुंचा, सर्दी ने दी दस्तक

जीआई टैग से क्या होगा फायदा
जीआई टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक पहचान से जोड़ता है और यह प्रमाणित करता है कि उसकी गुणवत्ता और विशेषताएं उसी क्षेत्र से जुड़ी हैं। इससे नकली या मिलावटी उत्पादों पर रोक लगेगी, किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बारां के लहसुन को नई पहचान मिलेगी। अधिकारियों का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि जिले के कृषि और विपणन क्षेत्र को भी नई गति मिलेगी।

 

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment