जकार्ता
पीएम मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया की यात्रा पर रहेंगे. ये दौरा समंदर सिक्योरिटी सिस्टम के लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है. उनकी इस यात्रा के पीछे सिर्फ दो देशों के पुराने रिश्ते नहीं हैं, बल्कि भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का वो सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है, जिसकी स्क्रिप्ट पिछले कुछ सालों से लिखी जा रही थी. भारत और इंडोनेशिया के बीच वैसे तो कई समझौतों पर बातचीत चल रही है, लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स से लेकर चीन तक, हर किसी की नजर सिर्फ एक ही प्रोजेक्ट पर टिकी है और वो है इंडोनेशिया का ‘साबांग पोर्ट’. जिससे समंदर का पूरा खेल ही पलट जाएगा।
साबांग पोर्ट: आखिर क्या है इस बंदरगाह की पूरी कहानी?
इंडोनेशिया के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी पिछले कुछ सालों में बहुत ज्यादा गहरी हुई है लेकिन इस पूरी पार्टनरशिप का जो सबसे कीमती ‘हीरा’ है, वो है साबांग पोर्ट प्रोजेक्ट. सबांग इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के बिल्कुल उत्तरी छोर पर स्थित एक छोटा सा बंदरगाह है. दिखने में ये जगह बहुत शांत और साधारण लग सकती है, लेकिन जब आप इसे दुनिया के नक्शे पर देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि ये कोई मामूली बंदरगाह नहीं है. ये ठीक उसी जगह पर मौजूद है जहां से दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता ‘मलक्का स्ट्रेट’ शुरू होता है।
भारत की अंडमान और निकोबार द्वीप श्रृंखला से साबांग पोर्ट की दूरी महज 150 किलोमीटर के आसपास है. यानी भारत के अपने नेवल बेस से ये जगह इतनी पास है कि भारतीय नौसेना बहुत ही कम समय में यहां अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकती है. पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान साबांग पोर्ट के कमर्शियल और मिलिट्री इस्तेमाल को लेकर जो ब्लूप्रिंट फाइनल हो रहा है, उसने चीन की रातों की नींद उड़ा दी है. भारत यहां केवल पैसे नहीं लगा रहा है, बल्कि वो इस पूरे इलाके की सुरक्षा का जिम्मा अपने हाथों में लेने की तैयारी कर रहा है।
मलक्का स्ट्रेट का वो सच, जिससे चीन को आते हैं बुरे सपने
अब सवाल ये उठता है कि आखिर इस साबांग पोर्ट और मलक्का स्ट्रेट से चीन का क्या लेना-देना है और वो इससे इतना क्यों घबरा रहा है? इस बात को समझने के लिए हमें चीन की सबसे बड़ी कमजोरी को जानना होगा. चीन आज भले ही दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अपनी सेना के दम पर पूरी दुनिया को आंखें दिखाता है, लेकिन उसकी लाइफलाइन एक बहुत ही संकरे समुद्री रास्ते के भरोसे टिकी है, जिसे मलक्का जलडमरूमध्य या चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ कहते हैं. यs इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच स्थित एक बेहद पतली समुद्री पट्टी है।
चीन जितना भी कच्चा तेल खाड़ी देशों और अफ्रीका से खरीदता है, उसका लगभग 80% हिस्सा इसी मलक्का स्ट्रेट से होकर चीन के बंदरगाहों तक पहुंचता है. इसके अलावा चीन दुनिया भर में जो अपना माल एक्सपोर्ट करता है, उसका भी एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर मलक्का स्ट्रेट चीन के लिए एक गले की नली की तरह है, जिसके बिना न तो उसे खाना मिल सकता है और न ही वो सांस ले सकता है. अगर कभी ये रास्ता बंद हो गया, तो चीन की पूरी इंडस्ट्री और उसकी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।
चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ और साबांग पोर्ट पर भारत का पहरा
चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने सालों पहले एक शब्द का इस्तेमाल किया था- ‘मलक्का डिलेमा’ (मलक्का का धर्मसंकट). चीन को हमेशा से ये डर सताता रहा है कि अगर कभी भारत या अमेरिका के साथ उसका कोई बड़ा युद्ध या विवाद होता है तो भारतीय नौसेना अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर मलक्का स्ट्रेट के मुहाने को पूरी तरह ब्लॉक कर देगी. अगर ऐसा हुआ तो चीन का पूरा व्यापार ठप हो जाएगा और उसकी सेना बिना तेल के कमजोर पड़ जाएगी. चीन का यही सबसे बड़ा डर है जिसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है।
अब सोचिए इसी मलक्का स्ट्रेट के ठीक एंट्री पॉइंट पर स्थित साबांग पोर्ट को जब भारत डेवलप कर रहा है, तो इसका क्या मतलब हुआ? इसका सीधा सा मतलब यह है कि साबांग पोर्ट पर भारत की मजबूत मौजूदगी सीधे तौर पर चीन की इस सबसे बड़ी कमजोरी पर भारत का एक पक्का पहरा बिठा देती है. इस बंदरगाह के पूरी तरह एक्टिव होने के बाद भारतीय नौसेना मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाले चीन के हर एक जहाज, हर एक सबमरीन और हर एक हरकत पर चौबीसों घंटे सीधी नजर रख पाएगी. ये चीन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है क्योंकि अब तक वो हिंद महासागर में भारत को घेरने की कोशिश कर रहा था, लेकिन पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के साथ मिलकर चीन को उसी के रास्ते पर घेर लिया है।
पीएम मोदी की इंडोनेशिया यात्रा जियोपॉलिटिक्स की नई स्क्रिप्ट
पीएम मोदी की इस इंडोनेशिया यात्रा के दौरान जब साबांग पोर्ट पर अंतिम मुहर लग रही है तो ये पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा मैसेज दे रहा है. अब तक चीन ये सोचता था कि वो अपनी आर्थिक ताकत के दम पर एशिया के छोटे देशों को डराकर रख सकता है लेकिन इंडोनेशिया जैसे बड़े और प्रभावशाली मुस्लिम बहुल देश ने भारत के साथ हाथ मिलाकर ये साफ कर दिया है कि वो इस इलाके में किसी एक देश की दादागिरी को स्वीकार नहीं करेगा. भारत और इंडोनेशिया का ये साथ ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ की असली ताकत को दिखाता है।
इस यात्रा के जरिए भारत न केवल साबांग पोर्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है, बल्कि दोनों देशों के बीच मैरीटाइम कोऑपरेशन को एक नए लेवल पर ले जा रहा है. आने वाले समय में अगर भारतीय नौसेना के जहाजों को साबांग पोर्ट पर लॉजिस्टिक सपोर्ट और रीफ्यूलिंग की सुविधा मिल जाती है तो चीन के लिए हिंद महासागर और मलक्का स्ट्रेट के आसपास मनमानी करना नामुमकिन हो जाएगा. पीएम मोदी की ये चाल बताती है कि भारत अब डिफेंसिव नहीं, बल्कि ऑफेंसिव कूटनीति पर चल रहा है और चीन की हर चाल का जवाब उसके अपने ही इलाके में जाकर दे रहा है।


