ईश भक्ति है सबसे सबल सहारा

भक्ति को राजमार्ग कहा गया है। ज्ञान और कर्म का मार्ग भी उसी मंजिल तक पहुंचाता है, परंतु वह कष्टसाध्य है। गीताकार ने ज्ञान द्वारा निराकार अव्यक्त परमेश्वर को प्राप्त करना दुष्कर बताया है। भक्ति द्वारा चित्त और बुद्धि को भगवान में स्थिर करना सरल और सुगम है। अभ्यास और विधि-विाधन के पालन से एकाग्रता प्राप्त की जा सकती है।

इस प्रकार कर्म, ज्ञान (ध्यान) और भक्ति के विकल्पों के बाद निष्कर्ष अंतिम अध्याय में है, जहां सब साधनों को छोड़कर शरणागति को जीवन की सर्वोच्च सिद्धि स्थापित किया गया है। बल्लभाचार्य और रामनुजाचार्य ने शरणागति को प्रपत्ति कहा है। यही भक्ति का सार है।

ये भी पढ़ें :  अहमदाबाद विमान हादसे पर अनुपम खेर हुए भावुक, बोले-‘ये हादसा सिर्फ खबर नहीं, दुखों का पहाड़ है’

भक्त दो प्रकार के होते हैं। प्रपन्न और शरणागत। दोनों शब्दों का अभिप्राय एक होने पर भी अंतर है। प्रपन्न भक्त में कर्त्ता की विशेषता रहती है। प्रपद चरण के ऊपर के भाग को कहते हैं। उसको पकड़ कर रखना प्रपत्ति है। श्री चंद्र दर्शन में इस स्थिति को एक उदाहरण से स्पष्ट किया गया है- कई जन्मों की उपासना के बाद भक्त को भगवान के दर्शन हुए। भगवान ने वर मांगने को कहा। भक्त बार-बार कहता रहा, कुछ नहीं चाहिए। अंत में आशीर्वाद देकर भगवान गरुड़ पर बैठकर जैसे ही जाने लगे, भक्त ने अचानक एक हाथ से उनका एक चरण पकड़ लिया, दूसरे हाथ से गरुड़ का एक पंजा थाम लिया। इस प्रकार वह वैकुंठ पहुंच गया और परमपद पा गया।

ये भी पढ़ें :  दर्द, भय और उसके इलाज को शानदार अंदाज में पेश करती हैं एड्स पर बनी ये फिल्में

कलिकाल में प्रपत्ति निभाना कठिन है। इसमें बंदरिया के बच्चे के समान जीवन की पकड़ अपनी होती है। बंदरिया एक वृक्ष से दूसरे पर, एक पहाड़ी से दूसरी पर छलांगें लगाती जाती है। उसके बच्चे को मां की कमर को कसकर पकड़ना होता है। जरा-सी असावधानी से गिरने का डर रहता है। शरणागति में कर्त्ता की नहीं शरण देने वाले की विशेषता और चेष्टा रहती है। बस एक बार भगवान स्वीकार कर लें तुम मेरे हो। शरणागत भक्त बिल्ली के बच्चे के समान अपने को भगवान के भरोसे छोड़ देता है। बिल्ली अपने नवजात को तीखे दांतों के बीच भी कोमलता से पकड़ कर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है। बच्चा मां पर अखंड आस्था के कारण निश्चिंत रहता है।

ये भी पढ़ें :  14 या 15 मार्च से शुरू होगा खरमास! शादियों समेत सभी मांगलिक कार्यों पर लगेगी रोक

द्रौपदी के चीरहरण की मर्मांतक कथा का निचोड़ यही है। जब तक जीव हाथ ऊपर करके अपनी सुरक्षा का भार भगवान पर नहीं छोड़ता उसे वह सुरक्षा-चक्र नहीं मिलता।

 

Share

क्लिक करके इन्हें भी पढ़ें

Leave a Comment