चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की जिम्मेदारी

चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की जिम्मेदारी

सरकारी व्यवस्था मजबूत करे और सभी के लिए उपलब्ध हो 

मध्य प्रदेश में पीपीपी मोड मेडिकल कॉलेजों का विरोध

भोपाल/ इंदौर
मध्य प्रदेश सरकार का 25 एकड़ भूमि 1 रुपये के नाममात्र मूल्य पर निजी मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए उपलब्ध कराने का निर्णय, स्वास्थ्य सेवाएँ और चिकित्सा शिक्षा, मजबूत सार्वजनिक व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध कराने की राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी के विपरीत है।

इससे पहले, मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के खिलाफ  विभिन्न संगठनों ने  विरोध किया —जिनमें      एमपीएमटीए-एमपी मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन, शासकीय स्वायत्तशासी चिकित्सा अधिकारी संघ, एमपीएमओए-एमपी मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन, ईएसआई चिकित्सा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी चिकित्सा शिक्षा, मध्य प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, मध्य प्रदेश नर्सिंग ऑफिसर एसोसिएशन,  कॉन्ट्रैक्चुअल डॉक्टर्स एसोसिएशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अभियान, संविदा चिकित्सक संघ,  एमपी आशा/उषा सहयोगिनी श्रमिक संघ) जन स्वास्थ्य अभियान मध्य प्रदेश, अस्पताल बचाओं जीव बचाओ संघर्ष मोर्चा मध्य प्रदेश, और अन्य संगठनों ने भाग लिया—इनके दबाव में सरकार को 12 जिला अस्पतालों को निजी हाथों में सौंपने का अपना फैसला वापस लेना पड़ा था।

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लेकिन अब, जनविरोध के बावजूद, सरकार भूमि और सुविधायें निजी संस्थाओं को देकर पीपीपी के नाम पर निजीकरण को फिर से लागू कर रही है। यह कोई वास्तविक साझेदारी नहीं है, बल्कि राज्य की मदद से निजी चिकित्सा क्षेत्र का विस्तार है, जिससे धार, बेतुल, पन्ना और कटनी में निजी मेडिकल कॉलेजों का रास्ता साफ हो रहा है। निजीकृत चिकित्सा शिक्षा मॉडल विशेष रूप से निम्न सामाजिक-आर्थिक स्तर के छात्रों के लिए समावेशी नहीं होते हैं बल्कि बहिष्कृत करने वाले होते हैं ।

ध्यान देने योग्य है कि प्रधानमंत्री की वायबिलिटी गैप फंडिंग योजना के तहत भारत सरकार पहले ही राज्य और केंद्र के संयुक्त वित्त से मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा कर चुकी है। इसलिए राज्य सरकार को चाहिए कि —

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1.    निजी मेडिकल कॉलेजों को सब्सिडी देने के बजाय सार्वजनिक मेडिकल कॉलेजों की स्थापना जारी रखे।
2.    मौजूदा सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पर्याप्त शिक्षक, बुनियादी ढाँचा और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराकर मजबूत करे।
3.    निजी कॉलेजों के साथ किए गए इन नए पीपीपी मॉडल एमओयू (MoU) की प्रति सार्वजनिक करे और इनको रद्द करें।
जिसमें यह स्पष्ट हो: 

•    सब्सिडी देने की प्रक्रिया क्या रही।
•    क्या छात्रों की फीस पर सीमा (कैप) होगी।
•    क्या कम से कम 25% सीटें गरीब छात्रों के लिए निःशुल्क होंगी।
•    इस तरह की साझेदारी से लंबे समय में जनता पर आर्थिक बोझ पड़ेगा।
अभी तक का अनुभव बताता है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा में ऐसे पीपीपी मॉडल अक्सर सस्ती, समान और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध कराने में असफल रहे हैं। इसके बजाय, ये छात्रों और मरीजों के लिए खर्च बढ़ाते हैं, असमानता बढ़ाते हैं और सार्वजनिक व्यवस्था को कमजोर करते हैं। सरकार को इस त्रुटिपूर्ण पहल को छोड़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक चिकित्सा शिक्षा को मजबूत और विस्तारित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि मध्य प्रदेश के सभी नागरिकों को सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें।

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भवदीय 
अमूल्य निधि, एस. आर. आजाद, राजकुमार सिन्हा, राहुल यादव, रामप्रसाद काजले, समीना युसुफ, लक्ष्मी कौरव, उमेश तिवारी, विष्णु बाजपेयी 

जन स्वास्थ्य अभियान, मध्य प्रदेश, बारगी बांध प्रभावित एवं विस्थापित संघ, नर्मदा बचाओ आंदोलन, जिंदगी बचाओ अभियान, पत्थर खदान मजदूर संघ, आशा / उषा सहयोगी श्रमिक संघ , टोंको रोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, कटनी जिला जन अधिकार मंच 

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