क्या 62% लोगों के लिए होम लोन होगा मुश्किल? CIBIL स्कोर के नए नियम ने बढ़ाई चिंता

 नई दिल्ली
RBI के ECL नियम लागू होने के बाद बैंकों को ज्यादा प्रावधान करना होगा, कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल वाले ग्राहकों के लिए बढ़ सकती हैं ब्याज दरें अगर आपका CIBIL स्कोर 730 से कम है तो आने वाले समय में होम लोन, ऑटो लोन और एजुकेशन लोन लेना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए 'ECL Direction-2026' के लागू होने के बाद बैंक जोखिम वाले ग्राहकों को कर्ज देने में अधिक सतर्कता बरतेंगे. बैंकिंग सेक्टर के जानकारों का मानना है कि कम क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहकों को या तो लोन मिलने में दिक्कत होगी या फिर उन्हें ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ेगा। 

कई मामलों में बैंक अतिरिक्त गारंटी या कोलेटरल की भी मांग कर सकते हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात है कि देश में करीब 62 फीसदी लोन आवेदकों का CIBIL स्कोर 730 से कम है. ऐसे में अगले साल से बड़ी संख्या में लोगों के लिए होम, ऑटो और एजुकेशन लोन हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। 

1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे नए नियम
RBI का 'Expected Credit Loss (ECL) Direction-2026' 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा. वर्तमान व्यवस्था में बैंक किसी लोन के एनपीए (Non-Performing Asset) बनने के बाद उसके लिए प्रावधान करते हैं. आमतौर पर ये स्थिति तब आती है, जब ग्राहक 90 दिनों तक किश्त नहीं चुकाता.  नई व्यवस्था में बैंकों को संभावित डिफॉल्ट का अनुमान पहले ही लगाना होगा और उसके हिसाब से अलग से रकम रखनी होगी. यानी लोन डूबने का इंतजार नहीं किया जाएगा और संभावित नुकसान के लिए पहले से तैयारी करनी होगी. जानकारों का मानना है कि इस व्यवस्था से बैंकिंग सेक्टर के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है और कुल मिलाकर करीब 42 हजार करोड़ रुपये तक का असर पड़ सकता है। 

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प्रीमियम ग्राहकों पर रहेगा ज्यादा फोकस
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नए नियम लागू होने के बाद बैंक उन ग्राहकों से ज्यादा ब्याज वसूल सकते हैं जिनमें डिफॉल्ट का जोखिम अधिक है. वहीं, बेहतर क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहकों को ब्याज दरों में रियायत और बेहतर शर्तों पर लोन मिलने की संभावना बढ़ सकती है. इसी वजह से बैंक 730 या उससे ज्यादा CIBIL स्कोर वाले ग्राहकों पर ज्यादा फोकस करेंगे. इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक देश में करीब 7 करोड़ ऐसे ग्राहक हैं जिनका क्रेडिट स्कोर 730 या उससे ज्यादा है। 

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बैंक कैसे लगाएंगे भविष्य के जोखिम का अनुमान?
ECL फ्रेमवर्क के तहत बैंक मौजूदा भुगतान स्थिति देखने के साथ कई दूसरे इंडिकेटर्स का भी एनालिसिस करेंगे जिनमें शामिल हैं-
-ग्राहक का भुगतान रिकॉर्ड
-CIBIL स्कोर में बदलाव
-आय में कमी या अस्थिरता
-नौकरी जाने का जोखिम
-लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो 
-मौजूदा कर्ज की स्थिति
इन आंकड़ों के आधार पर बैंक तय करेंगे कि भविष्य में डिफॉल्ट की आशंका कितनी है. 

डिफॉल्ट पर कई गुना बढ़ेगा प्रावधान

नए नियमों के तहत बैंकों को डिफॉल्ट की स्थिति में पहले के मुकाबले काफी ज्यादा रकम अलग रखनी होगी. उदाहरण के तौर पर, 25 लाख रुपये के होम लोन पर:
– 30 दिन की EMI डिफॉल्ट होने पर अभी करीब 10 हजार रुपये का प्रावधान करना पड़ता है, जो बढ़कर 25 हजार रुपये हो जाएगा.
– 31 से 60 दिन तक डिफॉल्ट रहने पर ये रकम 10 हजार रुपये से बढ़कर 1.25 लाख रुपये तक पहुंच सकती है.
90 दिन से ज्यादा के डिफॉल्ट की स्थिति में अभी 3.75 लाख रुपये (15%) का प्रावधान करना पड़ता है, जो बढ़कर 5 लाख रुपये हो जाएगा
इससे बैंकों की लागत बढ़ेगी और वे कर्ज देने के दौरान वो ज्यादा सावधानी बरतेंगे. 

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आम ग्राहकों पर क्या असर होगा?
जानकारों का मानना है कि ECL फ्रेमवर्क बैंकिंग सिस्टम को मजबूत बनाने और जोखिम की पहचान पहले करने की दिशा में बड़ा कदम है. हालांकि इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनका क्रेडिट स्कोर कमजोर है. ऐसे ग्राहकों को समय पर EMI भुगतान, क्रेडिट कार्ड बिल की नियमित अदायगी और कम कर्ज देनदारी बनाए रखने पर ध्यान देना होगा. बेहतर CIBIL स्कोर ही भविष्य में सस्ती ब्याज दर और आसान लोन मंजूरी की सबसे बड़ी कुंजी बन सकता है.  1 अप्रैल 2027 से नियम लागू होने के बाद बैंकों की लोन देने की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जहां फोकस लोन डिस्ट्रीब्यूशन के साथ ही ग्राहक की क्रेडिट क्वालिटी और जोखिम क्षमता पर रहेगा। 

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